संपादकीय

शरद कटियार

राजधानी दिल्ली की हवा एक बार फिर जहरीली होने लगी है। हवा में घुलता प्रदूषण अब केवल मौसम में बदलाव या सर्दियों की दस्तक से जुड़ी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह जनस्वास्थ्य, पर्यावरण और सरकारी नीतियों के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल बन चुका है। शुक्रवार को दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 230 दर्ज किया गया, जो खराब श्रेणी में आता है। वहीं, पूसा में एक्यूआई का स्तर 324 तक पहुंचना इस बात का संकेत है कि राजधानी के कुछ इलाकों में स्थिति बेहद खराब हो चुकी है। चिंता की बात यह है कि आने वाले दिनों में भी हवा की गुणवत्ता में बड़े सुधार की उम्मीद नहीं जताई गई है। ऐसे में दिल्लीवासियों के सामने एक बार फिर वही पुराना सवाल खड़ा है—आखिर स्वच्छ हवा में सांस लेना कब तक एक चुनौती बना रहेगा?

हवा में बढ़ता प्रदूषण किसी एक दिन की समस्या नहीं है। यह वर्षों से चली आ रही उन कमियों का परिणाम है, जिनमें अनियंत्रित वाहन उत्सर्जन, निर्माण स्थलों से उड़ती धूल, औद्योगिक गतिविधियां, कचरा जलाना और मौसमी परिस्थितियां अपनी-अपनी भूमिका निभाती हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के प्रदूषण में परिवहन क्षेत्र की अनुमानित हिस्सेदारी 20.3 प्रतिशत है। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि वाहनों से निकलने वाला धुआं राजधानी की बिगड़ती हवा का एक प्रमुख कारण है। इसके अतिरिक्त आवासीय गतिविधियां, उद्योग, निर्माण कार्य और पराली जलाने जैसी समस्याएं भी प्रदूषण के स्तर को प्रभावित करती हैं। ऐसे में केवल किसी एक स्रोत को जिम्मेदार ठहराकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।

दिल्ली में वायु प्रदूषण का सबसे गंभीर पहलू इसका स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव है। खराब हवा का असर केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहता, जिन्हें पहले से अस्थमा या सांस संबंधी बीमारियां हैं। बच्चे, बुजुर्ग और खुले वातावरण में काम करने वाले लोग भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। प्रदूषित हवा में लंबे समय तक सांस लेना श्वसन तंत्र और हृदय संबंधी स्वास्थ्य के लिए जोखिम बढ़ा सकता है। विडंबना यह है कि जिस हवा में सांस लेना जीवन की सबसे सामान्य जरूरत है, वही हवा लाखों लोगों के लिए स्वास्थ्य संबंधी चिंता का कारण बनती जा रही है। स्वच्छ हवा कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन की बुनियादी आवश्यकता है।

हर वर्ष प्रदूषण बढ़ने पर बैठकों, निर्देशों, चेतावनियों और अस्थायी उपायों का दौर शुरू हो जाता है। सड़कों पर पानी का छिड़काव किया जाता है, निर्माण गतिविधियों की निगरानी बढ़ाने की बात होती है और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को नियंत्रित करने के निर्देश जारी किए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन उपायों का स्थायी परिणाम कितना दिखाई देता है? यदि प्रदूषण का संकट हर साल लगभग उसी तरह सामने आता है, तो यह स्पष्ट है कि मौजूदा प्रयासों को अधिक प्रभावी, नियमित और जवाबदेह बनाने की जरूरत है। संकट के चरम पर सक्रिय होना पर्याप्त नहीं है; प्रदूषण के स्रोतों पर पूरे वर्ष नियंत्रण रखना आवश्यक है।

सबसे पहले परिवहन व्यवस्था में सुधार को प्राथमिकता देनी होगी। सार्वजनिक परिवहन को अधिक सुलभ, भरोसेमंद और सुविधाजनक बनाना होगा, ताकि लोग निजी वाहनों पर निर्भरता कम कर सकें। पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना होगा। निर्माण स्थलों पर धूल रोकने के लिए निर्धारित मानकों का पालन कराया जाए और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो। कचरा तथा खुले में पत्तियां जलाने पर रोक केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। औद्योगिक इकाइयों के उत्सर्जन की नियमित निगरानी भी जरूरी है। दिल्ली के साथ-साथ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अन्य शहरों को भी इस साझा जिम्मेदारी में शामिल करना होगा, क्योंकि प्रदूषण की समस्या प्रशासनिक सीमाओं में बंधकर नहीं रहती।

पराली जलाने का मुद्दा भी अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन जाता है। किसानों की कठिनाइयों, फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन और पर्यावरणीय जरूरतों को एक साथ समझना होगा। किसानों को वैकल्पिक तकनीक, मशीनों और आर्थिक सहायता की उपलब्धता सुनिश्चित किए बिना केवल दंडात्मक उपायों से स्थायी समाधान की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं होगा। इसी प्रकार, प्रदूषण फैलाने वाले अन्य स्रोतों पर भी वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए। समस्या के वास्तविक कारणों की पहचान और उनके अनुरूप समाधान ही कारगर साबित हो सकते हैं।

इस पूरे संकट में नागरिकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, लेकिन जिम्मेदारी का पूरा बोझ आम लोगों पर डालना उचित नहीं होगा। सरकारों और संबंधित एजेंसियों को प्रभावी नीतियां, बेहतर परिवहन व्यवस्था, नियमित निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। नागरिक निजी वाहनों का अनावश्यक उपयोग कम करके, कचरा नहीं जलाकर और प्रदूषण संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करके सहयोग कर सकते हैं। साथ ही, प्रदूषण के आंकड़ों और सरकारी कार्रवाइयों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए, ताकि लोगों को पता चल सके कि समस्या कितनी गंभीर है और उसके समाधान के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

दिल्ली की हवा का फिर खराब होना केवल पर्यावरण से जुड़ी खबर नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी की परीक्षा है। स्वच्छ हवा के लिए मौसमी अभियान नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति चाहिए। केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार, पड़ोसी राज्यों और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर समन्वय के बिना इस समस्या पर निर्णायक नियंत्रण संभव नहीं है। प्रदूषण के स्तर में गिरावट को केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि ठोस परिणामों से मापा जाना चाहिए।

आज जरूरत इस बात की है कि स्वच्छ हवा को विकास की प्राथमिकताओं में सर्वोच्च स्थान दिया जाए। सड़कें, इमारतें और औद्योगिक प्रगति तभी सार्थक हैं, जब नागरिक स्वस्थ जीवन जी सकें। यदि राजधानी की हवा लगातार सांस लेने योग्य बनाए रखने में व्यवस्था सफल नहीं होती, तो विकास के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। दिल्ली को प्रदूषण से राहत दिलाने के लिए अब तात्कालिक प्रतिक्रियाओं से आगे बढ़कर स्थायी और जवाबदेह कदम उठाने होंगे। आखिर स्वच्छ हवा किसी सरकार की मेहरबानी नहीं, हर नागरिक का अधिकार है।