डॉ. विजय गर्ग
भारत विश्व के सर्वाधिक जैव विविधता वाले देशों में से एक है। यहाँ विशाल वन, घास के मैदान, आर्द्रभूमियाँ, पर्वत, रेगिस्तान और समुद्र तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पाए जाते हैं। ये प्राकृतिक आवास बंगाल टाइगर, एशियाई शेर, एशियाई हाथी, एक सींग वाले गैंडे, हिम तेंदुए, घड़ियालों तथा पक्षियों, सरीसृपों और कीटों की असंख्य प्रजातियों को आश्रय देते हैं। लेकिन प्रकृति की यह अनमोल संपदा आज आवासों के विनाश, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, अवैध शिकार और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी बढ़ती चुनौतियों का सामना कर रही है। इन कठिनाइयों के बावजूद भारत के वन्यजीव संरक्षण के प्रयास आशा की किरण जगाते हैं।
वन्यजीवों की घटती संख्या का बढ़ता संकट
वन्यजीवों की संख्या में गिरावट केवल कुछ जानवरों के लुप्त होने की समस्या नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र दबाव में हैं। बढ़ते शहर, सड़कें, रेलवे लाइनें, खनन, कृषि और औद्योगिक विकास प्राकृतिक आवासों को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट रहे हैं। जब जंगल काटे जाते हैं या खंडित हो जाते हैं, तो जानवर भोजन, आश्रय, प्रजनन स्थलों और सुरक्षित आवागमन के मार्गों से वंचित हो जाते हैं।
अवैध शिकार और वन्यजीवों का गैरकानूनी व्यापार भी गंभीर खतरे पैदा करते हैं। जानवरों को उनकी खाल, हड्डियों, सींगों और शरीर के अन्य अंगों के लिए मारा जाता है। पक्षियों और सरीसृपों को भी अवैध व्यापार के लिए पकड़ा जाता है। प्रदूषण, कीटनाशक, प्लास्टिक कचरा और दूषित पानी स्थलीय तथा जलीय जीवों के अस्तित्व को प्रभावित करते हैं।
जलवायु परिवर्तन इन समस्याओं को और गंभीर बना रहा है। बढ़ता तापमान, वर्षा के बदलते स्वरूप, लंबे सूखे, बाढ़ और जंगलों में लगने वाली आग प्राकृतिक आवासों को बदल सकती हैं तथा भोजन की उपलब्धता कम कर सकती हैं। हिमालय जैसे विशिष्ट पर्यावरणीय क्षेत्रों में रहने वाली प्रजातियाँ विशेष रूप से प्रभावित हो सकती हैं।
मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष
जैसे-जैसे मानव बस्तियाँ वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों के निकट फैल रही हैं, मनुष्यों और जानवरों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है। हाथी फसलों को नुकसान पहुँचा सकते हैं, तेंदुए गाँवों में प्रवेश कर सकते हैं और बड़े मांसाहारी जानवर कभी-कभी पशुओं या मनुष्यों पर हमला कर सकते हैं। ऐसी घटनाओं से जान-माल की हानि होती है और कई बार जानवरों की भी मृत्यु हो जाती है।
इसलिए संरक्षण के प्रयासों में वन्यजीवों के साथ-साथ मानव समुदायों की सुरक्षा भी आवश्यक है। समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियाँ, वन्यजीव गलियारे, उपयुक्त बाड़, त्वरित सहायता दल और नुकसान का समय पर मुआवजा संघर्ष कम करने में सहायक हो सकते हैं। स्थानीय समुदायों को संरक्षण की योजना बनाने में शामिल करना तथा जिम्मेदार प्रकृति पर्यटन से मिलने वाले आर्थिक लाभों में उनकी उचित भागीदारी सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
वन्यजीव संरक्षण तभी सफल हो सकता है, जब किसानों, वन-आश्रित समुदायों और संरक्षित क्षेत्रों के निकट रहने वाले लोगों की वास्तविक समस्याओं को समझा जाए। टकराव की तुलना में सहयोग अधिक प्रभावी है।
भारत की संरक्षण संबंधी सफलताएँ
इन चुनौतियों के बावजूद भारत ने दिखाया है कि निरंतर और वैज्ञानिक प्रयासों से संकटग्रस्त प्रजातियों की संख्या में सुधार लाया जा सकता है।
1973 में शुरू किया गया प्रोजेक्ट टाइगर बाघ संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था। इसके अंतर्गत संरक्षित क्षेत्रों का विकास, आवास प्रबंधन और अवैध शिकार के विरुद्ध कार्रवाई को बढ़ावा दिया गया। भारत के वर्ष 2022 के आधिकारिक आकलन में जंगली बाघों की संख्या लगभग 3,682 अनुमानित की गई थी। इस अनुमान में सांख्यिकीय अनिश्चितता भी शामिल थी। फिर भी, यह प्रगति वैज्ञानिक निगरानी, आवास संरक्षण और समन्वित प्रयासों के महत्त्व को दर्शाती है।
गुजरात के गिर क्षेत्र और आसपास के इलाकों में पाया जाने वाला एशियाई शेर संरक्षण की एक अन्य उल्लेखनीय सफलता है। उसके आवास की सुरक्षा और शिकार पर प्रतिबंधों ने उसकी संख्या में सुधार करने में मदद की है। हालाँकि, सीमित भौगोलिक क्षेत्र में उसकी अधिक उपस्थिति के कारण बीमारी से बचाव और अन्य सुरक्षित आवास विकसित करना भी महत्त्वपूर्ण है।
असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में एक सींग वाले भारतीय गैंडे के संरक्षण ने भी उत्साहजनक परिणाम दिए हैं। अवैध शिकार के विरुद्ध कार्रवाई, आवास प्रबंधन और योजनाबद्ध संरक्षण कार्यक्रमों ने उसकी पुनर्बहाली में योगदान दिया है।
इसी प्रकार, मगरमच्छ संरक्षण कार्यक्रमों ने कुछ प्रजातियों की संख्या में सुधार किया है। चुनिंदा क्षेत्रों में स्थानीय रूप से विलुप्त या घटती प्रजातियों को फिर से स्थापित करने के प्रयास भी प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के नए अवसर प्रदान करते हैं।
ये सफलताएँ बताती हैं कि वन्यजीवों की गिरावट हमेशा अपरिवर्तनीय नहीं होती। वैज्ञानिक योजना, दृढ़ प्रतिबद्धता और समुदायों की भागीदारी से प्रकृति को फिर से स्वस्थ बनाया जा सकता है।
संरक्षित क्षेत्र और वन्यजीव गलियारे
राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य, संरक्षण रिजर्व और सामुदायिक रिजर्व भारत की वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था की आधारशिला हैं। ये जानवरों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराते हैं और शोध, शिक्षा तथा जिम्मेदार पर्यटन के अवसर भी प्रदान करते हैं।
लेकिन केवल संरक्षित क्षेत्र बनाना पर्याप्त नहीं है। भोजन, साथी और प्रजनन के लिए उपयुक्त स्थान खोजने हेतु कई जानवरों को अलग-अलग जंगलों के बीच आवागमन करना पड़ता है। वन्यजीव गलियारे खंडित आवासों को जोड़ते हैं और जानवरों को सुरक्षित रूप से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक जाने में मदद करते हैं। हाथियों, बाघों और अन्य दूर तक विचरण करने वाली प्रजातियों के लिए इन गलियारों का विशेष महत्त्व है।
विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभावों का गंभीर आकलन, वन्यजीवों के लिए सुरक्षित मार्ग और प्राकृतिक आवासों के विखंडन को कम करने वाले उपाय शामिल होने चाहिए। आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय साथ-साथ आगे बढ़ाना आवश्यक है।
नागरिकों और तकनीक की भूमिका
वन्यजीव संरक्षण केवल सरकारों और वन विभागों की जिम्मेदारी नहीं है। नागरिक अवैध वन्यजीव व्यापार से जुड़े उत्पादों से दूर रहकर, प्लास्टिक का उपयोग कम करके, पानी बचाकर और विश्वसनीय संरक्षण संगठनों का समर्थन करके योगदान दे सकते हैं।
विद्यालयों में जैव विविधता सर्वेक्षण, प्रकृति भ्रमण, पक्षी अवलोकन और जागरूकता अभियान आयोजित किए जा सकते हैं। ऐसे अनुभव बच्चों में जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता और प्राकृतिक संतुलन की समझ विकसित करते हैं।
आधुनिक तकनीक भी संरक्षण के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। कैमरा ट्रैप, उपग्रह आधारित निगरानी, ड्रोन, भौगोलिक सूचना प्रणाली और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से जानवरों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है, अवैध शिकार के जोखिम पहचाने जा सकते हैं और आवासों में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जा सकता है। हालाँकि, तकनीक को मैदानी अनुसंधान और स्थानीय ज्ञान का सहयोगी बनना चाहिए, उनका विकल्प नहीं।
आशा और जिम्मेदारी से जुड़ा भविष्य
भारत के वन्यजीवन की कहानी न तो पूरी तरह निराशाजनक है और न ही पूर्ण सफलता की कहानी। कुछ प्रजातियों की संख्या में उत्साहजनक सुधार हुआ है, जबकि अन्य अभी भी संकटग्रस्त हैं या उनके बारे में वैज्ञानिक जानकारी सीमित है। संरक्षण की उपलब्धियों के कारण लापरवाह नहीं होना चाहिए, क्योंकि बढ़ती आबादी, बुनियादी ढाँचे का विस्तार और जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक आवासों पर लगातार दबाव डाल रहे हैं।
आगे बढ़ने के लिए वन्यजीव अपराधों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई, नष्ट हुए पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की सार्थक भागीदारी आवश्यक है। सरकारों, वैज्ञानिकों, व्यावसायिक संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों और नागरिकों को जैव विविधता की रक्षा के लिए साझा जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
वन्यजीव संरक्षण वास्तव में उन प्राकृतिक प्रणालियों की रक्षा है, जिन पर मानव जीवन निर्भर करता है। वन जलवायु और जल चक्र को संतुलित रखते हैं, आर्द्रभूमियाँ बाढ़ के जोखिम को कम करती हैं और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र कृषि तथा आजीविका को सहारा देते हैं। इसलिए वन्यजीवों की रक्षा कोई विलासिता नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक भविष्य में निवेश है।
भारत ने दिखाया है कि दृढ़ संरक्षण प्रयास प्रजातियों को विलुप्ति के कगार से वापस ला सकते हैं। अब चुनौती यह है कि इस आशा को अधिक क्षेत्रों तक पहुँचाया जाए और केवल प्रसिद्ध जानवरों ही नहीं, बल्कि कम पहचानी जाने वाली प्रजातियों, कीटों, उभयचरों और उन प्राकृतिक आवासों की भी रक्षा की जाए, जिन पर समस्त जीवन निर्भर करता है।
भारत के वन्यजीवों का भविष्य आज लिए जाने वाले निर्णयों पर निर्भर करेगा। यदि विकास प्रकृति की सीमाओं का सम्मान करे और स्थानीय समुदाय संरक्षण के भागीदार बनें, तो भारत गिरावट की कहानी को संघर्षशीलता, पुनर्बहाली और स्थायी आशा की कहानी में बदल सकता है।
डॉ. विजय गर्ग
सेवानिवृत्त प्रिंसिपल | प्रख्यात शिक्षाविद् | शैक्षिक स्तंभकार
स्ट्रीट कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107

