डॉ. विजय गर्ग

विज्ञान आधुनिक सभ्यता की नींव है। यह हमें प्रकृति को समझने, ब्रह्मांड का अन्वेषण करने, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार लाने, तकनीक विकसित करने और दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान खोजने में सहायता करता है। लेकिन विज्ञान को पढ़ाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भाषा काफी हद तक यह निर्धारित करती है कि विद्यार्थी वैज्ञानिक अवधारणाओं को कितनी आसानी से समझ पाते हैं। भारत सहित अनेक देशों में अंग्रेज़ी को वैज्ञानिक शिक्षा और व्यावसायिक सफलता से जोड़कर देखा जाता है। यद्यपि अंग्रेज़ी अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संवाद की एक महत्वपूर्ण भाषा है, फिर भी अपनी मातृभाषा में विज्ञान सीखने से ज्ञान अधिक सुलभ, अर्थपूर्ण और समावेशी बन सकता है।

विज्ञान शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल परिभाषाओं, समीकरणों और वैज्ञानिक शब्दावली को याद करना नहीं है। इसका उद्देश्य जिज्ञासा, तार्किक चिंतन, अवलोकन, प्रयोग करने की क्षमता और प्रश्न पूछने की आदत विकसित करना है। जब विद्यार्थियों को शिक्षा के माध्यम की भाषा समझने में कठिनाई होती है, तो उनका ध्यान वैज्ञानिक विचारों को समझने के बजाय अपरिचित शब्दों के अर्थ जानने में लग जाता है। परिचित भाषा में विज्ञान पढ़ाने से यह बाधा कम होती है और विद्यार्थी विषय की मूल अवधारणाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।

रटने से पहले समझना आवश्यक

बच्चे विद्यालय जाने से पहले ही अपने आसपास की दुनिया के बारे में सीखना शुरू कर देते हैं। वे वर्षा को देखते हैं, ऋतुओं में होने वाले बदलावों को महसूस करते हैं, पौधों को बढ़ते हुए देखते हैं और सोचते हैं कि चंद्रमा का आकार बदलता हुआ क्यों दिखाई देता है। इन अनुभवों को सामान्यतः उसी भाषा में समझा और व्यक्त किया जाता है, जो घर में बोली जाती है। जब विज्ञान की शिक्षा इसी परिचित भाषाई आधार पर विकसित होती है, तो जटिल अवधारणाओं को समझना आसान हो जाता है।

उदाहरण के लिए, कपड़ों के सूखने से वाष्पीकरण, ठंडे गिलास की बाहरी सतह पर पानी की बूंदें बनने से संघनन और किसी फल के नीचे गिरने से गुरुत्वाकर्षण को समझाया जा सकता है। जब विद्यार्थी इन अनुभवों पर अपनी समझ की भाषा में चर्चा करते हैं, तो सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बन जाती है। परिचित शब्द कक्षा के ज्ञान को दैनिक जीवन से जोड़ते हैं और बच्चों को सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

जो विद्यार्थी किसी वैज्ञानिक सिद्धांत को अपनी मातृभाषा में समझ लेता है, वह धीरे-धीरे उसकी औपचारिक शब्दावली अंग्रेज़ी या किसी अन्य भाषा में भी सीख सकता है। पहले अवधारणा की स्पष्ट समझ विकसित होनी चाहिए और उसके बाद तकनीकी शब्दावली को व्यवस्थित ढंग से सिखाया जाना चाहिए।

भारत की भाषाई विविधता: एक मूल्यवान संसाधन

भारत असाधारण भाषाई विविधता वाला देश है। पंजाबी, हिंदी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती, मलयालम, कन्नड़, ओड़िया, असमिया और अनेक अन्य भाषाओं में समृद्ध सांस्कृतिक ज्ञान तथा दुनिया को समझने के विशिष्ट दृष्टिकोण मौजूद हैं। इस विविधता को बाधा मानने के बजाय शिक्षा के एक मूल्यवान संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में विशेष रूप से विद्यालयी शिक्षा के शुरुआती वर्षों में, जहाँ तक संभव हो, घर की भाषा, मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा देने पर बल दिया गया है। यह दृष्टिकोण स्वीकार करता है कि बच्चे अक्सर उस भाषा में अधिक प्रभावी ढंग से सीखते हैं, जिससे वे परिचित होते हैं।

हालाँकि, इस दृष्टिकोण को लागू करने के लिए सुविचारित योजना आवश्यक है। विभिन्न भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकें, वैज्ञानिक शब्दकोश, प्रयोगशाला पुस्तिकाएँ, शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम और डिजिटल शैक्षिक सामग्री विकसित की जानी चाहिए। केवल अनुवाद करना पर्याप्त नहीं है। शैक्षिक सामग्री वैज्ञानिक दृष्टि से सटीक, सांस्कृतिक रूप से प्रासंगिक तथा विद्यार्थियों की आयु और सीखने के स्तर के अनुरूप होनी चाहिए।

मातृभाषा और वैज्ञानिक चिंतन

विज्ञान प्रश्न पूछने, तर्क करने और प्रयोग करने से आगे बढ़ता है। विद्यार्थियों में इतना आत्मविश्वास होना चाहिए कि वे पूछ सकें कि कोई रासायनिक अभिक्रिया क्यों होती है, कोई मशीन कैसे काम करती है या किसी वैज्ञानिक दावे के समर्थन में क्या प्रमाण हैं। यदि वे भाषाई गलतियाँ करने से डरते हैं, तो अपने विचार व्यक्त करने में झिझक सकते हैं।

परिचित भाषा में सीखने से कक्षा का वातावरण अधिक सहज बन सकता है। विद्यार्थी अंग्रेज़ी पर अपनी सीमित पकड़ के कारण अनावश्यक रूप से बाधित हुए बिना अपने अवलोकनों पर चर्चा कर सकते हैं, परिकल्पनाएँ समझा सकते हैं और तर्कों की जाँच कर सकते हैं। शिक्षक भी उनकी गलत धारणाओं को आसानी से पहचानकर गहन विचार-विमर्श को प्रोत्साहित कर सकते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं है कि मातृभाषा में शिक्षा देने से अपने आप बेहतर परिणामों की गारंटी मिल जाती है। शिक्षण की गुणवत्ता, प्रयोगात्मक गतिविधियाँ, कक्षा के संसाधन और विद्यार्थियों की व्यक्तिगत आवश्यकताएँ भी महत्वपूर्ण हैं। इसका प्रमुख लाभ अनावश्यक भाषाई बाधाओं को कम करना और विषय की समझ को मजबूत बनाना है।

अंग्रेज़ी का महत्व भी बना रहेगा

भारतीय भाषाओं में विज्ञान शिक्षा का समर्थन करने का अर्थ अंग्रेज़ी का विरोध करना नहीं होना चाहिए। अंग्रेज़ी अंतरराष्ट्रीय शोधपत्रों, वैज्ञानिक पत्रिकाओं, उच्चस्तरीय पाठ्यपुस्तकों, सम्मेलनों और वैश्विक व्यावसायिक अवसरों तक पहुँचने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए विद्यार्थियों को अपनी परिचित भाषा के साथ-साथ अंग्रेज़ी में भी वैज्ञानिक जानकारी समझने में सक्षम बनाया जाना चाहिए।

द्विभाषी या बहुभाषी शिक्षा इस दिशा में प्रभावी समाधान प्रस्तुत कर सकती है। शिक्षक पहले मातृभाषा में किसी अवधारणा को समझा सकते हैं, फिर उससे संबंधित वैज्ञानिक शब्दावली अंग्रेज़ी में बता सकते हैं और विद्यार्थियों को दोनों भाषाओं में चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। पाठ्यपुस्तकों में क्षेत्रीय भाषाओं और अंग्रेज़ी के समानार्थी वैज्ञानिक शब्द शामिल किए जा सकते हैं।

उदाहरण के लिए, पंजाबी में प्रकाश संश्लेषण पढ़ने वाला विद्यार्थी पहले इस प्रक्रिया को अपनी भाषा में समझ सकता है और फिर उच्च शिक्षा के लिए आवश्यक अंग्रेज़ी शब्दावली सीख सकता है। इससे उसकी वैज्ञानिक समझ और अंतरराष्ट्रीय ज्ञान तक पहुँचने की भाषाई क्षमता दोनों विकसित होती हैं।

उद्देश्य विद्यार्थियों के अवसरों को बढ़ाना होना चाहिए, न कि उन्हें किसी एक भाषा तक सीमित करना।

तकनीक भाषाई दूरी कम कर सकती है

डिजिटल तकनीक विज्ञान की शिक्षा को अनेक भाषाओं में उपलब्ध कराने के नए अवसर प्रदान करती है। ऑनलाइन व्याख्यान, एनिमेशन आधारित स्पष्टीकरण, शैक्षिक ऐप, शोध के अनुवादित सारांश और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित शिक्षण उपकरण विद्यार्थियों को कठिन अवधारणाएँ समझने में सहायता कर सकते हैं।

ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के विद्यार्थियों को अपनी भाषा में निःशुल्क तथा गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक संसाधनों से विशेष लाभ मिल सकता है। हालाँकि, डिजिटल अनुवादों की सावधानीपूर्वक जाँच आवश्यक है, क्योंकि गलत वैज्ञानिक शब्दावली भ्रम पैदा कर सकती है। सामग्री का व्यापक उपयोग करने से पहले शिक्षकों और विषय विशेषज्ञों द्वारा उसकी शुद्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

सरकारों, विश्वविद्यालयों, प्रकाशकों और तकनीकी संस्थानों को मिलकर सुलभ बहुभाषी वैज्ञानिक सामग्री विकसित करनी चाहिए। निःशुल्क शैक्षिक संसाधन विद्यालयों को महँगी पाठ्यपुस्तकों और संदर्भ सामग्री की कमी दूर करने में भी मदद कर सकते हैं।

शिक्षक: भाषाओं के बीच सेतु

स्थानीय भाषाओं को वैश्विक वैज्ञानिक ज्ञान से जोड़ने में शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें मातृभाषा और अंग्रेज़ी में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, वे वैज्ञानिक सिद्धांत समझाने के लिए स्थानीय कृषि, घरेलू गतिविधियों, पारंपरिक शिल्प और प्राकृतिक वातावरण से जुड़े उदाहरणों का उपयोग कर सकते हैं।

पंजाब में मिट्टी, सिंचाई, फसलों की वृद्धि और मौसम पर चर्चा करके विद्यार्थियों के दैनिक अनुभवों को जीवविज्ञान, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान से जोड़ा जा सकता है। ऐसे उदाहरण शिक्षा को जीवन से जोड़ते हैं और विद्यार्थियों को अपने आसपास की दुनिया में वैज्ञानिक सिद्धांतों की पहचान करना सिखाते हैं।

शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शिक्षकों को अवधारणाएँ स्पष्ट रूप से समझाने, उपयुक्त वैज्ञानिक शब्दावली का उपयोग करने और मातृभाषा के साथ-साथ विद्यार्थियों की अंग्रेज़ी में वैज्ञानिक दक्षता विकसित करने के लिए तैयार किया जाना चाहिए।

समावेशी वैज्ञानिक भविष्य की ओर

भाषा ज्ञान के द्वार खोलने का माध्यम होनी चाहिए, न कि उसके रास्ते की बाधा। किसी गाँव में रहने वाले प्रतिभाशाली विद्यार्थी को भी भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीवविज्ञान या खगोल विज्ञान समझने के उतने ही अवसर मिलने चाहिए, जितने किसी शहरी अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालय के विद्यार्थी को मिलते हैं। वैज्ञानिक क्षमता केवल किसी विशेष भाषा में दक्षता पर नहीं, बल्कि जिज्ञासा, तर्कशक्ति, परिश्रम और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच पर निर्भर करती है।

भारत की वैज्ञानिक प्रगति तब और मजबूत होगी, जब अधिक लोग वैज्ञानिक खोजों को समझ सकेंगे, प्रमाणों का मूल्यांकन कर सकेंगे और ज्ञान का उपयोग स्थानीय समस्याओं के समाधान में कर सकेंगे। मातृभाषा में विज्ञान सीखने से अधिक विद्यार्थियों की भागीदारी सुनिश्चित हो सकती है, बुनियादी समझ मजबूत हो सकती है और युवाओं को वैज्ञानिक करियर अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।

आगे बढ़ने का रास्ता न तो अंग्रेज़ी को छोड़ना है और न ही भारतीय भाषाओं के महत्व को कम आँकना। आवश्यकता ऐसी शिक्षा व्यवस्था की है, जिसमें विभिन्न भाषाएँ एक-दूसरे की पूरक बनें और प्रत्येक विद्यार्थी आत्मविश्वास के साथ सीख सके।

विज्ञान संपूर्ण मानवता की साझा धरोहर है, किसी एक भाषा की संपत्ति नहीं। जब वैज्ञानिक ज्ञान विद्यार्थियों तक उस भाषा में पहुँचता है, जिसे वे सबसे अच्छी तरह समझते हैं, तो वह केवल पाठ्यपुस्तक में छपी जानकारी नहीं रह जाता। वह स्वतंत्र चिंतन, नवाचार और सामाजिक प्रगति का साधन बन जाता है।

विज्ञान शिक्षा का भविष्य इसी में है कि ज्ञान को हर भाषा में, हर व्यक्ति के लिए समझने योग्य बनाया जाए।

डॉ. विजय गर्ग

सेवानिवृत्त प्राचार्य | प्रख्यात वैज्ञानिक

गली कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107

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