यूथ इंडिया
मध्य-पूर्व में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बनता दिखाई दे रहा है। ईरान पर नए सिरे से सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं से क्षेत्र में संघर्ष के और व्यापक होने का खतरा पैदा हो गया है। यदि अमेरिका और इजराइल दोबारा बड़े स्तर पर हमले करते हैं, तो इसका प्रभाव केवल इन देशों तक सीमित रहने की आशंका नहीं होगी, बल्कि खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। मौजूदा हालात यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या सैन्य दबाव के जरिए ईरान को अपनी नीतियों में बदलाव के लिए तैयार किया जा सकता है या फिर इससे संघर्ष का एक और खतरनाक दौर शुरू हो सकता है।
ईरान के सैन्य ढांचे को नुकसान पहुंचाने और उस पर आर्थिक तथा रणनीतिक दबाव बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद यदि राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो पाती है, तो सैन्य कार्रवाई की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। दोनों देश चाहते हैं कि ईरान की परमाणु गतिविधियों पर ऐसी सीमाएं लगें, जिनसे परमाणु हथियार विकसित करने की उसकी संभावनाओं को रोका जा सके। दूसरी ओर, ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर अलग रुख रखता है और बाहरी दबाव को अपनी संप्रभुता से जोड़कर देखता है। यही मतभेद इस विवाद को लगातार जटिल बनाते रहे हैं।
नए हमलों की संभावित रणनीति में ईरान के ऊर्जा प्रतिष्ठानों, परमाणु सुविधाओं, मिसाइल ठिकानों और ड्रोन निर्माण से जुड़े केंद्रों को निशाना बनाए जाने की आशंका जताई जा रही है। ऐसी कार्रवाई से ईरान की सैन्य क्षमताओं और औद्योगिक ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है, लेकिन इसके साथ ही जवाबी हमलों का खतरा भी बढ़ जाएगा। किसी देश के सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमला होने के बाद संघर्ष का दायरा अक्सर उन क्षेत्रों तक फैल सकता है, जिन्हें शुरुआत में प्रत्यक्ष युद्ध का हिस्सा नहीं माना जाता। मध्य-पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, इजराइल और खाड़ी देशों की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह जोखिम विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
अमेरिकी नेतृत्व के सामने भी सैन्य कार्रवाई से जुड़े कई रणनीतिक प्रश्न होंगे। बड़े पैमाने पर सैन्य संसाधन जुटाना और उनका इस्तेमाल करना अपने आप में किसी राजनीतिक लक्ष्य की प्राप्ति की गारंटी नहीं है। यदि हमलों के बाद ईरान अपनी नीतियों में बदलाव करने के बजाय प्रतिरोध और तेज कर देता है, तो संघर्ष लंबा खिंच सकता है। इसके परिणामस्वरूप सैन्य खर्च बढ़ने, क्षेत्रीय अस्थिरता गहराने और कूटनीतिक समाधान की संभावनाएं सीमित होने का खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए किसी भी सैन्य कदम के साथ उसके संभावित परिणामों और आगे की रणनीति पर विचार करना जरूरी है।
ईरान की जवाबी कार्रवाई की क्षमता भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू है। बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन और अन्य सैन्य प्रणालियों के इस्तेमाल से क्षेत्र में मौजूद सैन्य ठिकानों तथा रणनीतिक प्रतिष्ठानों को खतरा हो सकता है। ईरान पहले भी यह संकेत देता रहा है कि उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई होने पर वह क्षेत्र में अमेरिकी हितों और सहयोगी देशों के ठिकानों को निशाना बना सकता है। ऐसे किसी भी कदम का प्रभाव उन देशों पर भी पड़ सकता है, जो प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में शामिल नहीं हैं, लेकिन जिनकी भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा व्यवस्थाएं इस संघर्ष से जुड़ी हुई हैं।
खाड़ी क्षेत्र के देशों के लिए ऊर्जा प्रतिष्ठानों की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंताओं में शामिल होगी। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य तेल उत्पादक देशों की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा ऊर्जा उत्पादन और निर्यात पर निर्भर है। यदि तेल क्षेत्रों, रिफाइनरियों, पाइपलाइनों, बंदरगाहों या निर्यात केंद्रों पर हमले होते हैं, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में तेल की कीमतों में तेजी आने की संभावना बढ़ जाएगी। हालांकि, कीमतों में वास्तविक बदलाव हमलों की गंभीरता, आपूर्ति में आई कमी, वैकल्पिक उत्पादन और अंतरराष्ट्रीय बाजार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने पर भारत का आयात बिल बढ़ सकता है। इससे रुपये पर दबाव, परिवहन लागत में वृद्धि और महंगाई से जुड़ी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। पेट्रोलियम उत्पादों की लागत बढ़ने का असर माल ढुलाई, कृषि, उद्योग और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों तक पहुंच सकता है। यदि ऊर्जा बाजार में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है, तो इसका प्रभाव आर्थिक विकास और सरकारी वित्तीय प्रबंधन पर भी पड़ सकता है।

