(कुमार कृष्णन-विनायक फीचर्स)

काम को पूजा मानना और जीवन की कठिनाइयों के बीच हास्यबोध बनाए रखना किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाता है। सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन में कर्मनिष्ठा, निर्भीकता और व्यावहारिक बुद्धि का ऐसा ही मेल दिखाई देता है। उन्होंने साधारण किसान परिवार से निकलकर स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी पहचान बनाई और आजाद भारत की राजनीतिक एकता को मजबूत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। 31 अक्टूबर को उनकी जयंती पर उन्हें याद करना केवल एक महान नेता का स्मरण करना नहीं, बल्कि उस दृष्टि को समझना भी है, जिसने विविधताओं से भरे भारत को एक राजनीतिक सूत्र में बांधने का कठिन कार्य किया।

गुजरात के नडियाद में 31 अक्टूबर 1875 को झवेरभाई पटेल और लाडबाई के घर जन्मे वल्लभभाई का बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता। खेती-किसानी, खेत-खलिहान और गांव के जीवन ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय लोकजीवन में रामायण और महाभारत की कथाओं से मिलने वाले संस्कारों के साथ श्रम, साहस और कर्तव्य का बोध उनके जीवन में रचा-बसा था। आगे चलकर वे वकालत के पेशे में आए और अपनी योग्यता के बल पर सफल वकील बने, लेकिन उनका जीवन व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रहा। देश की परिस्थितियों ने उन्हें सार्वजनिक जीवन की ओर खींचा और उन्होंने अपनी ऊर्जा स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्पित कर दी।

पटेल के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे भारत की समस्याओं को जमीन से जुड़कर समझते थे। किसान परिवार में पले-बढ़े होने के कारण वे कृषि और ग्रामीण समाज की कठिनाइयों से परिचित थे। खेड़ा सत्याग्रह में उनकी भूमिका ने उन्हें किसानों के बीच लोकप्रिय बनाया। फसल खराब होने के बावजूद लगान में राहत नहीं देने के औपनिवेशिक रवैये के विरुद्ध किसानों ने संगठित संघर्ष किया। पटेल ने गांव-गांव जाकर लोगों को एकजुट किया और उनमें यह विश्वास पैदा किया कि संगठित जनशक्ति अन्याय का मुकाबला कर सकती है।

बारडोली सत्याग्रह उनके सार्वजनिक जीवन का निर्णायक पड़ाव बना। 1928 में गुजरात के बारडोली क्षेत्र के किसानों ने बढ़े हुए लगान के खिलाफ आंदोलन किया। पटेल ने किसानों को अनुशासन, एकजुटता और अहिंसक प्रतिरोध का रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित किया। आंदोलन की सफलता ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई और किसानों ने उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि दी। यह सम्मान किसी सत्ता या संस्था ने नहीं, बल्कि संघर्षरत जनता ने दिया था। उनके नेतृत्व की असली ताकत यही थी कि वे लोगों की समस्याओं को अपना प्रश्न बनाते और संघर्ष को ठोस परिणाम तक पहुंचाने का प्रयास करते थे।

महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद पटेल स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हो गए। गांधीजी की अहिंसा और सत्याग्रह की नीति से प्रेरित होकर उन्होंने अनेक आंदोलनों को संगठित करने में भूमिका निभाई। हालांकि उनका स्वभाव गांधीजी से अलग था। गांधीजी नैतिक आग्रह और जनजागरण पर विशेष बल देते थे, जबकि पटेल संगठन, अनुशासन और व्यावहारिक निर्णयों के लिए जाने जाते थे। इन भिन्नताओं के बावजूद दोनों के बीच गहरा विश्वास था। स्वतंत्रता आंदोलन को जनाधार देने और कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाने में पटेल का योगदान उल्लेखनीय रहा।

15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन स्वतंत्रता के साथ विभाजन की त्रासदी, विस्थापन, सांप्रदायिक हिंसा और प्रशासनिक चुनौतियां भी सामने थीं। सबसे बड़ी समस्याओं में से एक थी देशी रियासतों का भविष्य। ब्रिटिश शासन के अंत के साथ सैकड़ों रियासतों के सामने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने अथवा अलग रहने का प्रश्न खड़ा था। यदि ये रियासतें अलग-अलग राजनीतिक इकाइयों के रूप में बनी रहतीं, तो भारत की एकता और स्थिरता गंभीर संकट में पड़ सकती थी।

स्वतंत्र भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में पटेल ने इस चुनौती का सामना किया। वी. पी. मेनन के सहयोग से उन्होंने रियासतों के शासकों के साथ संवाद, कूटनीति और परिस्थितियों के अनुसार दृढ़ कार्रवाई का सहारा लिया। अधिकांश रियासतों का भारतीय संघ में विलय उनके नेतृत्व की बड़ी उपलब्धि बना। जूनागढ़ और हैदराबाद जैसे जटिल मामलों में भी उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। इस प्रक्रिया में तत्कालीन सरकार के अन्य नेताओं और अधिकारियों का योगदान भी था, लेकिन पटेल की राजनीतिक इच्छाशक्ति और निर्णय क्षमता ने एकीकरण को निर्णायक दिशा दी।

आज भारत का मानचित्र जिस व्यापक राजनीतिक एकता को दर्शाता है, उसके निर्माण में पटेल की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। उनकी दूरदृष्टि केवल रियासतों के विलय तक सीमित नहीं थी। वे समझते थे कि स्वतंत्रता को टिकाऊ बनाने के लिए सक्षम प्रशासनिक संस्थाएं जरूरी हैं। अखिल भारतीय सेवाओं के प्रति उनका समर्थन इसी सोच का परिणाम था। वे चाहते थे कि प्रशासनिक व्यवस्था देश की एकता, शासन की निरंतरता और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम हो।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ पटेल के संबंधों को भी ऐतिहासिक संदर्भ में समझना चाहिए। महात्मा गांधी की हत्या के बाद फरवरी 1948 में संघ पर प्रतिबंध लगा और उस समय पटेल गृह मंत्री थे। संघ के साथ उनके पत्राचार तथा सार्वजनिक वक्तव्यों से स्पष्ट होता है कि वे राष्ट्रीय एकता, कानून के पालन और सांप्रदायिक सद्भाव को लेकर गंभीर थे। वे प्रतिबंध हटाने के प्रश्न पर संगठन के आचरण और सुधारों को महत्व देते थे। उनके दृष्टिकोण को किसी संगठन के प्रति अंधसमर्थन या स्थायी विरोध के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास को सरल बनाकर देखने जैसा होगा। पटेल के लिए किसी भी संगठन की स्वीकार्यता उसके आचरण और देश के प्रति जिम्मेदारी से जुड़ी थी। उनके जीवन से यह सीख मिलती है कि राजनीतिक मतभेदों के बीच भी संवाद और संवैधानिक मर्यादा का महत्त्व बना रहना चाहिए।

पटेल की निर्भीकता का अर्थ केवल कठोर निर्णय लेना नहीं था। वे परिस्थितियों का व्यावहारिक आकलन करते, उपलब्ध विकल्पों पर विचार करते और फिर निर्णय लेने से पीछे नहीं हटते थे। कश्मीर सहित स्वतंत्रता के बाद के अनेक प्रश्नों पर तत्कालीन नेतृत्व के भीतर अलग-अलग विचार थे। इन जटिल मुद्दों को किसी एक व्यक्ति की सफलता या विफलता में समेट देना उचित नहीं होगा। इतिहास को उसके समय, परिस्थितियों और सामूहिक निर्णयों के संदर्भ में देखना चाहिए। फिर भी राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक एकता के प्रति पटेल की प्रतिबद्धता निर्विवाद थी।

आज उनकी जयंती पर सबसे जरूरी सवाल यह है कि हम उनकी विरासत को किस रूप में ग्रहण करते हैं। सरदार पटेल का नाम केवल प्रतिमाओं, स्मारकों और सरकारी आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनकी किसान पृष्ठभूमि हमें याद दिलाती है कि राष्ट्र निर्माण का आधार ग्रामीण समाज और मेहनतकश जनता भी है। किसानों की आजीविका, ग्रामीण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की समस्याओं को हल किए बिना मजबूत भारत का सपना अधूरा रहेगा। जिस नेता ने किसानों के बीच संघर्ष करके जनविश्वास अर्जित किया, उसकी स्मृति का सम्मान किसानों की वास्तविक कठिनाइयों को समझने और उनका समाधान खोजने में भी दिखाई देना चाहिए।

पटेल की दृढ़ता से प्रेरणा लेने का अर्थ यह नहीं कि संवाद की जगह कठोरता और असहमति की जगह एकरूपता को स्थापित किया जाए। मजबूत राष्ट्र वही होता है, जिसकी संस्थाएं सक्षम हों और जिसके नागरिक अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति सजग हों।

सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन बताता है कि बड़े राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए केवल भावनाएं पर्याप्त नहीं होतीं। उसके लिए संगठन क्षमता, राजनीतिक इच्छाशक्ति, अनुशासन, दूरदृष्टि और जनविश्वास की आवश्यकता होती है। उन्होंने किसान आंदोलन से लेकर रियासतों के एकीकरण तक अपने कर्म से यह सिद्ध किया कि दृढ़ संकल्प और व्यावहारिक बुद्धि मिलकर इतिहास की दिशा बदल सकते हैं। उनकी जयंती पर सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम भारत की एकता को न्याय, समानता और नागरिक सम्मान से जोड़ें। सरदार पटेल की विरासत किसी एक दल या विचारधारा की संपत्ति नहीं, बल्कि उस साझा राष्ट्रीय प्रयत्न का हिस्सा है, जिसके बल पर भारत एक स्वतंत्र और एकजुट गणराज्य बना। (विनायक फीचर्स)