डॉ. विजय गर्ग

कृषि को अक्सर भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है और किसानों को देश का पेट भरने वाला अन्नदाता माना जाता है। लेकिन खेतों में काम करते किसान की आम तस्वीर के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी हुई है, जिस पर अक्सर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। लाखों महिलाएँ कृषि क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं, फिर भी उन्हें पहचान, भूमि के स्वामित्व, निर्णय लेने के अधिकार और समान अवसर प्राप्त करने में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। वे बीज बोती हैं, पौधों की रोपाई करती हैं, खरपतवार निकालती हैं, फसल काटती हैं, पशुओं की देखभाल करती हैं और घर की जिम्मेदारियाँ भी निभाती हैं। इतना बड़ा योगदान देने के बावजूद अनेक महिला किसान कृषि नीतियों, वित्तीय सहायता और सामाजिक सम्मान के क्षेत्र में हाशिये पर रह जाती हैं।

उनकी कहानी केवल मेहनत की कहानी नहीं है, बल्कि उनके योगदान और उन्हें मिलने वाले अधिकारों, संसाधनों तथा सम्मान के बीच मौजूद अंतर की कहानी भी है।

कृषि की अनदेखी आधारशिला हैं महिलाएँ

महिलाएँ कृषि उत्पादन के लगभग हर चरण में भागीदारी निभाती हैं। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में वे खेत तैयार करने, बीज बोने, धान की रोपाई करने, खरपतवार निकालने, फसल काटने, अनाज का भंडारण करने और पशुओं की देखभाल करने का काम करती हैं। इसके अतिरिक्त, वे डेयरी व्यवसाय, मुर्गीपालन, घरेलू बागवानी, बीज संरक्षण और कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

कई क्षेत्रों में पुरुष रोजगार की तलाश में शहरों या दूसरे राज्यों की ओर चले जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में महिलाएँ खेतों और परिवार की दोहरी जिम्मेदारियाँ संभालती हैं। वे बुवाई, सिंचाई, मजदूरों और पशुओं की देखभाल से जुड़े निर्णय भी लेती हैं, लेकिन इसके साथ घर का बिना वेतन वाला काम भी करती रहती हैं।

इतनी जिम्मेदारियाँ निभाने के बावजूद, ‘किसान’ शब्द का संबंध अक्सर पुरुषों से जोड़कर देखा जाता है। पारिवारिक खेतों में काम करने वाली महिलाओं को कई बार स्वतंत्र किसान मानने के बजाय केवल सहायक समझा जाता है। पहचान की यह कमी केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भूमि अभिलेखों, बैंक ऋण, सरकारी योजनाओं, फसल बीमा और कृषि प्रशिक्षण तक उनकी पहुँच को भी प्रभावित कर सकती है।

भूमि के स्वामित्व की चुनौती

महिला किसानों के सामने सबसे बड़ी बाधाओं में से एक कृषि भूमि का स्वामित्व और उस पर नियंत्रण न होना है। अनेक परिवारों में भूमि पुरुष रिश्तेदारों के नाम पर विरासत में मिलती है या उन्हीं के नाम पर दर्ज होती है। महिलाएँ दशकों तक उसी भूमि पर काम करती रहती हैं, लेकिन उनके नाम मालिक या मान्यता प्राप्त किसान के रूप में दर्ज नहीं होते।

औपचारिक भूमि अधिकारों के अभाव में महिलाओं को कृषि ऋण लेने, फसल बीमा करवाने, फसल नष्ट होने पर मुआवजा प्राप्त करने और कुछ सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने में कठिनाइयाँ हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त, भूमि के उपयोग, निवेश और खेती के भविष्य से जुड़े दीर्घकालीन निर्णयों में भी उनकी भूमिका सीमित रह सकती है।

भारत में महिलाओं के उत्तराधिकार संबंधी अधिकारों के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन जागरूकता की कमी, सामाजिक परंपराएँ, पारिवारिक दबाव और व्यावहारिक कठिनाइयाँ अनेक महिलाओं को अपने अधिकारों का उपयोग करने से रोक सकती हैं। इसलिए समस्या केवल कानूनों की कमी नहीं है, बल्कि कानूनी अधिकारों और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच मौजूद अंतर भी है।

महिलाओं को किसान के रूप में मान्यता देने का अर्थ केवल उनकी मेहनत को स्वीकार करना नहीं है। इसके लिए भूमि के स्वामित्व, किरायेदारी के अधिकारों और स्वतंत्र कृषि संबंधी निर्णय लेने के लिए आवश्यक संसाधनों तक उनकी वास्तविक पहुँच सुनिश्चित करनी होगी।

खेत और घर की दोहरी जिम्मेदारी

महिला किसानों को अक्सर दोहरी मेहनत करनी पड़ती है। उनका दिन सूर्योदय से पहले खाना बनाने, पानी लाने, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करने और घरेलू कामों से शुरू हो सकता है। इसके बाद वे कई घंटे खेतों में काम करती हैं और घर लौटकर खाना बनाने, सफाई करने, बच्चों की देखभाल तथा बुजुर्गों की सेवा जैसी जिम्मेदारियाँ निभाती हैं।

घर और परिवार की देखभाल से जुड़ा यह बहुत-सा काम बिना वेतन के होता है और आर्थिक उत्पादकता के पारंपरिक मापदंडों में इसकी पूरी गणना नहीं की जाती। परिणामस्वरूप, परिवार के कल्याण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं के कुल योगदान का अक्सर कम आकलन किया जाता है।

जहाँ स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता, बिजली, बच्चों की देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी होती है, वहाँ यह बोझ और बढ़ जाता है। कृषि के व्यस्त मौसम में महिलाओं को तेज धूप में लंबे समय तक काम करना पड़ता है। इस दौरान वे गर्मी, कीटनाशकों, धूल और शारीरिक रूप से थका देने वाले कार्यों के संपर्क में भी आती हैं।

उनके योगदान को उचित मान्यता देने के लिए कामकाज की परिस्थितियों में सुधार, शारीरिक श्रम का बोझ कम करना और आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराना जरूरी है।

ऋण, तकनीक और प्रशिक्षण तक असमान पहुँच

आधुनिक कृषि में उन्नत बीजों, सिंचाई, मशीनीकरण, डिजिटल जानकारी, बाजार संबंधी सूचनाओं और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन भूमि के स्वामित्व की कमी, आर्थिक बाधाओं, आवागमन संबंधी प्रतिबंधों और औपचारिक कृषि नेटवर्क से दूर रहने के कारण महिला किसानों को इन संसाधनों तक पहुँचने में कठिनाई हो सकती है।

जिन महिलाओं के पास भूमि के स्वामित्व के दस्तावेज या अन्य आवश्यक जमानत नहीं होती, उनके लिए बैंकों से ऋण प्राप्त करना कठिन हो सकता है। कृषि विभागों के प्रशिक्षण और परामर्श कार्यक्रम कई बार पुरुष किसानों को ध्यान में रखकर तैयार किए जाते हैं। घरेलू जिम्मेदारियों, असुविधाजनक समय और परिवहन की कमी के कारण महिलाओं के लिए इन कार्यक्रमों में भाग लेना भी मुश्किल हो सकता है।

डिजिटल सुविधाओं की कमी एक अन्य बाधा है। मौसम का पूर्वानुमान जानने, फसलों की बीमारियों की जानकारी प्राप्त करने, सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने और मंडियों के भाव जानने के लिए मोबाइल फोन, इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता का महत्त्व बढ़ रहा है। जिन महिलाओं के पास इन साधनों तक स्वतंत्र पहुँच नहीं होती, वे अनेक उपयोगी अवसरों से वंचित रह सकती हैं।

महिलाओं को सस्ते ऋण, कृषि मशीनरी, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, डिजिटल सेवाओं और कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन तक समान पहुँच मिलनी चाहिए। प्रशिक्षण कार्यक्रमों का समय और तरीका ऐसा होना चाहिए, जो महिलाओं की वास्तविक जरूरतों और कामकाज की परिस्थितियों के अनुकूल हो।

मजदूरी, बाजार और निर्णय लेने का अधिकार

महिला कृषि मजदूरों को कई बार कम मजदूरी, अस्थिर रोजगार और अपने अधिकारों के लिए बातचीत करने की सीमित क्षमता का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं की सीमा क्षेत्र, काम के प्रकार और कृषि पद्धतियों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है, लेकिन अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में लैंगिक असमानता अब भी चिंता का विषय है।

महिलाएँ फसल उत्पादन में बड़ा योगदान देती हैं, फिर भी खेती से होने वाली आय पर उनका नियंत्रण सीमित हो सकता है। कौन-सी फसल बोई जाए, उपज कब बेची जाए, कमाई का उपयोग कैसे किया जाए और मशीनरी में निवेश किया जाए या नहीं—ऐसे निर्णयों में कई बार पुरुष परिवार के सदस्यों का अधिक प्रभाव होता है।

कई किसान संगठनों, सहकारी समितियों, कृषि समितियों और नेतृत्व के पदों पर भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है। इन संस्थाओं में उनकी आवाज मजबूत नहीं होने के कारण नीतियाँ और विकास कार्यक्रम तैयार करते समय उनकी जरूरतों को पर्याप्त महत्त्व नहीं मिल पाता।

किसान संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक कंपनियों और स्थानीय निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से उनकी सौदेबाजी की क्षमता और कृषि नीतियों को प्रभावित करने की शक्ति बढ़ सकती है।

महिला किसान और जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन कृषि के लिए नई चुनौतियाँ पैदा कर रहा है। अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, बढ़ता तापमान, मिट्टी का क्षरण और कीटों के बदलते प्रकोप फसल उत्पादन तथा ग्रामीण आजीविका के लिए खतरा बन रहे हैं।

महिला किसानों को सीमित वित्तीय बचत, भूमि पर असुरक्षित अधिकारों और बीमा, सिंचाई तकनीक तथा औपचारिक सहायता प्रणालियों तक सीमित पहुँच के कारण अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। जब फसल खराब होती है, तो उन्हें कम संसाधनों के साथ भोजन की कमी, घरेलू खर्च और परिवार की देखभाल जैसी जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं।

इसके साथ ही, महिलाओं के पास बीजों, मिट्टी, पशुपालन, खाद्य संरक्षण और स्थानीय जैव विविधता से संबंधित बहुमूल्य पारंपरिक ज्ञान होता है। इस ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों के साथ जोड़कर कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के लिए अधिक सक्षम बनाया जा सकता है।

महिलाओं को जलवायु अनुकूलन योजनाओं, जल प्रबंधन समितियों, बीज बैंकों, आपदा तैयारी कार्यक्रमों और कृषि अनुसंधान में शामिल किया जाना चाहिए। उन्हें केवल सहायता प्राप्त करने वाली लाभार्थियों के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञानवान और सक्षम निर्णयकर्ता के रूप में देखा जाना चाहिए।

समानता की दिशा में व्यावहारिक कदम

महिला किसानों की स्थिति सुधारने के लिए सरकारों, वित्तीय संस्थानों, कृषि संगठनों और ग्रामीण समुदायों के संयुक्त प्रयास आवश्यक हैं।

1. भूमि अधिकार मजबूत करें: जहाँ उचित हो, संयुक्त भूमि स्वामित्व को प्रोत्साहित किया जाए। उत्तराधिकार संबंधी अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाए और भूमि पंजीकरण तथा किरायेदारी के दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया महिलाओं के लिए सरल बनाई जाए।

2. वित्तीय सुविधाओं में सुधार करें: महिला किसानों के लिए उपयुक्त ऋण, फसल बीमा, बचत के अवसर और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों का विस्तार किया जाए।

3. जरूरतों के अनुरूप कृषि प्रशिक्षण दें: महिलाओं को आधुनिक खेती, मिट्टी के स्वास्थ्य, जल संरक्षण, कीट प्रबंधन, मशीनीकरण और जलवायु-अनुकूल कृषि के बारे में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए।

4. महिला समूहों को मजबूत करें: स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और महिलाओं के नेतृत्व वाले कृषि उद्यमों को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि बाजार, भंडारण, प्रसंस्करण और उचित मूल्य तक उनकी पहुँच बढ़ सके।

5. महिलाओं के काम को मान्यता दें: कृषि संबंधी आँकड़ों में लिंग के आधार पर जानकारी एकत्र की जाए तथा सरकारी अभिलेखों और योजनाओं में महिला किसानों एवं कृषि मजदूरों की सही पहचान सुनिश्चित की जाए।

6. बिना वेतन वाले श्रम का बोझ कम करें: स्वच्छ पानी, बच्चों की देखभाल, स्वच्छता, ऊर्जा सुविधाओं और श्रम कम करने वाली तकनीकों में निवेश किया जाए, ताकि घरेलू और कृषि कार्यों का बोझ घट सके।

7. उचित रोजगार सुनिश्चित करें: महिला कृषि मजदूरों के लिए पारदर्शी मजदूरी व्यवस्था, सुरक्षित कार्यस्थल, सुरक्षा उपकरण और शिकायतों के समाधान की प्रभावी प्रणाली होनी चाहिए।

8. निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी बढ़ाएँ: गाँव स्तर की कृषि समितियों, जल उपयोगकर्ता समूहों, सहकारी संस्थाओं, नीति संबंधी चर्चाओं और नेतृत्व के पदों पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाए।

पहचान से वास्तविक अधिकारों तक

महिला किसानों को केवल सहानुभूति की जरूरत नहीं है। उन्हें समान अवसर, सुरक्षित अधिकार, संसाधनों तक पहुँच और अपने जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में सार्थक भागीदारी चाहिए। उनके योगदान को केवल भाषणों और समारोहों में नहीं, बल्कि भूमि अभिलेखों, ऋण प्रणालियों, कृषि योजनाओं, बाजारों और संस्थाओं में भी मान्यता मिलनी चाहिए।

जिस कृषि व्यवस्था में उसे संभालने वाले लोगों को ही समान अवसर नहीं मिलते, वह अपनी पूरी क्षमता से विकास नहीं कर सकती। महिला किसानों को सशक्त बनाने से परिवारों की आय बढ़ सकती है, खाद्य सुरक्षा मजबूत हो सकती है, टिकाऊ कृषि को प्रोत्साहन मिल सकता है और ग्रामीण समुदायों का समग्र विकास हो सकता है।

निष्कर्ष

महिला किसानों की कहानी संघर्ष, कौशल, समर्पण और दृढ़ता की कहानी है। लेकिन यह हमें यह भी याद दिलाती है कि कड़ी मेहनत करने से अपने आप पहचान और समानता नहीं मिल जाती। देश का पेट भरने में योगदान देने वाली महिलाओं को कृषि व्यवस्था में अदृश्य नहीं रहना चाहिए।

हमारा उद्देश्य महिलाओं की मेहनत की केवल प्रशंसा करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा करना भी होना चाहिए। भूमि तक सुरक्षित पहुँच, उचित मजदूरी, सस्ते ऋण, आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और निर्णय लेने में समान भागीदारी वास्तविक सशक्तीकरण के लिए आवश्यक हैं।

जब महिला किसानों को उनके उचित अधिकार और संसाधन मिलेंगे, तो इसका लाभ केवल उनके परिवारों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पूरा समाज मजबूत होगा। बीज बोने और फसल काटने वाले हाथ केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि स्वामित्व, अवसर और समानता के भी हकदार हैं।

डॉ. विजय गर्ग

सेवानिवृत्त प्रिंसिपल | प्रख्यात वैज्ञानिक

गली कौर चंद, एम.एच.आर. मलोट, पंजाब – 152107

मोबाइल: 9465682110