नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों पर गंभीर चिंता जताई है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे मामलों में आम नागरिकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि डिजिटल धोखाधड़ी रोकने के लिए बैंकों और वित्तीय संस्थानों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि किसी वित्तीय संस्थान की उचित जांच-पड़ताल में विफलता के कारण धोखाधड़ी होती है, तो पीड़ित को हुए नुकसान की भरपाई की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में पीड़ितों को कम-से-कम गंवाई गई रकम के बराबर मुआवजा देने के मुद्दे पर विचार किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान डिजिटल अरेस्ट के तरीकों को लेकर भी चिंता जताई गई। साइबर अपराधी अक्सर पुलिस, सीबीआई या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बनकर लोगों को डराते हैं और उन्हें वीडियो कॉल पर निगरानी में होने का विश्वास दिलाते हैं। इस तरह पीड़ितों पर दबाव बनाकर उनसे बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर कराए जाते हैं। अदालत की टिप्पणियों ने ऐसे अपराधों से निपटने की आवश्यकता को फिर से रेखांकित किया।

सुप्रीम कोर्ट की इस पहल से डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों में बैंकों की जवाबदेही और पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था पर महत्वपूर्ण चर्चा होने की उम्मीद है। हालांकि, मुआवजे से जुड़े अंतिम नियम और बैंकों की जिम्मेदारी का दायरा अदालत के आगे के आदेशों पर निर्भर करेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, लोगों को अनजान कॉल पर भरोसा नहीं करना चाहिए और किसी भी व्यक्ति के दबाव में आकर पैसे ट्रांसफर करने से बचना चाहिए।