डॉ. विजय गर्ग

दीवाली भारत के सबसे लोकप्रिय और उल्लासपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह पर्व अंधकार पर प्रकाश, अज्ञान पर ज्ञान और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस अवसर पर घरों को दीपों, रंग-बिरंगी रोशनी, रंगोलियों और फूलों से सजाया जाता है। परिवार और मित्र एक-दूसरे को मिठाइयाँ और उपहार देकर खुशियाँ बाँटते हैं। लेकिन उत्सव की इन खुशियों के बीच हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हमारी परंपराएँ तभी सार्थक हैं, जब वे प्रकृति और पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी मजबूत करें।

आज दीवाली के उत्सव के साथ वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, प्लास्टिक कचरे और संसाधनों की बर्बादी जैसी समस्याएँ भी बढ़ रही हैं। ऐसे में आवश्यकता है कि हम त्योहार की मूल भावना को बनाए रखते हुए इसे पर्यावरण के अनुकूल बनाएँ।

पटाखों का धुआँ और स्वास्थ्य पर प्रभाव

दीवाली के दौरान पटाखे जलाने से वायुमंडल में धुआँ, सूक्ष्म कण और विभिन्न हानिकारक गैसें फैलती हैं। इससे वायु की गुणवत्ता खराब हो सकती है और विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों तथा श्वसन संबंधी समस्याओं से पीड़ित लोगों को परेशानी हो सकती है। पटाखों की तेज आवाज से भी लोगों और पशु-पक्षियों को तनाव होता है।

हमें यह समझना होगा कि त्योहार की खुशी दूसरों के स्वास्थ्य और शांति की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। पटाखों के स्थान पर मिट्टी के दीये, सजावटी रोशनी, पारिवारिक मिलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामूहिक उत्सव अपनाकर भी दीवाली को यादगार बनाया जा सकता है।

मिट्टी के दीये और भारतीय परंपराएँ

दीवाली का वास्तविक सौंदर्य मिट्टी के दीयों की सौम्य रोशनी में दिखाई देता है। स्थानीय कुम्हारों द्वारा बनाए गए दीये खरीदने से पारंपरिक कला को प्रोत्साहन मिलता है और छोटे कारीगरों की आजीविका को सहारा मिलता है। दीयों के साथ घरों को फूलों, पत्तियों और पुनः उपयोग की जा सकने वाली सजावटी वस्तुओं से सजाया जा सकता है।

हालाँकि, पर्यावरण संरक्षण के लिए केवल मिट्टी के दीये जलाना ही पर्याप्त नहीं है। तेल और बाती का विवेकपूर्ण उपयोग, बिजली की बचत, सजावटी वस्तुओं का पुनः उपयोग तथा कचरे का उचित निपटान भी आवश्यक है। एलईडी लाइटों का सीमित और जिम्मेदार उपयोग बिजली की खपत कम करने में मदद कर सकता है।

स्वच्छता और कचरा प्रबंधन

दीवाली से पहले घरों और आसपास के क्षेत्रों की सफाई करना हमारी पुरानी परंपरा है। लेकिन सफाई का अर्थ केवल घर को चमकाना नहीं, बल्कि आसपास की सड़कों, गलियों, पार्कों और सार्वजनिक स्थानों को भी स्वच्छ रखना है।

त्योहार के दौरान प्लास्टिक की थैलियों, थर्मोकोल की सजावट और एक बार इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं से बचना चाहिए। उपहारों को कागज, कपड़े या पुनः उपयोग योग्य सामग्री में पैक किया जा सकता है। मिठाइयों और भोजन की बर्बादी रोकने के लिए आवश्यकता के अनुसार ही खरीदारी करनी चाहिए। बची हुई खाद्य सामग्री को सुरक्षित रूप से जरूरतमंद लोगों तक पहुँचाना भी एक अच्छी पहल हो सकती है।

दीवाली के बाद पटाखों के अवशेष, कागज, प्लास्टिक और अन्य कचरे को इधर-उधर फेंकने के बजाय उचित ढंग से एकत्र करके उसका निपटान करना चाहिए। उत्सव की स्वच्छता तभी पूरी होगी, जब उसकी जिम्मेदारी हम स्वयं उठाएँगे।

बच्चों को दें पर्यावरण संरक्षण की सीख

बच्चे वही सीखते हैं, जो वे अपने परिवार और समाज में देखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं पर्यावरण के अनुकूल दीवाली मनाएँगे, तो बच्चों में भी प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित होगी। स्कूलों में हरित दीवाली पर निबंध, पोस्टर, भाषण और जागरूकता अभियान आयोजित किए जा सकते हैं।

बच्चों को समझाना चाहिए कि त्योहारों का उद्देश्य केवल वस्तुएँ खरीदना और आतिशबाजी करना नहीं, बल्कि प्रेम, सहयोग, दया और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देना है। जरूरतमंद परिवारों की सहायता करना, बुजुर्गों के साथ समय बिताना और पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील रहना भी दीवाली की खुशियों को बढ़ाता है।

पर्यावरण-अनुकूल दीवाली के लिए छोटे कदम

हम कुछ सरल उपाय अपनाकर इस पर्व को अधिक जिम्मेदार बना सकते हैं:

- पटाखों से परहेज करें और धुआँ तथा शोर कम करने में योगदान दें।

- मिट्टी के दीये और स्थानीय कारीगरों की वस्तुएँ खरीदें।

- बिजली की बचत करें और अनावश्यक रोशनी बंद रखें।

- प्लास्टिक तथा एक बार उपयोग होने वाली सजावटी वस्तुओं से बचें।

- भोजन की बर्बादी रोकें और जरूरतमंदों के साथ खुशियाँ बाँटें।

- दीवाली के बाद कचरे का उचित निपटान करें।

- पेड़-पौधों की देखभाल करें और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लें।

निष्कर्ष

दीवाली केवल दीप जलाने का त्योहार नहीं, बल्कि अपने जीवन में प्रकाश, सद्भाव और सकारात्मकता लाने का अवसर है। यदि हमारी खुशियों से पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है, तो हमें अपनी उत्सव मनाने की शैली पर पुनर्विचार करना चाहिए। सच्चा उत्सव वही है, जिसमें मनुष्य के साथ-साथ प्रकृति, पशु-पक्षियों और आने वाली पीढ़ियों के हितों का भी ध्यान रखा जाए।

आइए, इस दीवाली हम ऐसा संकल्प लें कि हमारे घर रोशनी से जगमगाएँ, हमारे संबंध प्रेम से महकें और हमारा वातावरण स्वच्छ बना रहे। मिट्टी के दीये जलाएँ, जरूरतमंदों के चेहरों पर मुस्कान लाएँ और प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों से बचें।

खुशियों के दीप जलाएँ, प्रदूषण दूर भगाएँ—परंपराओं को निभाएँ और पर्यावरण भी बचाएँ। यही सच्ची, सुंदर और जिम्मेदार दीवाली है।

डॉ. विजय गर्ग

सेवानिवृत्त प्राचार्य | प्रख्यात वैज्ञानिक

स्ट्रीट कौर चंद, एमएचआर मलोट, पंजाब – 152107