शरद कटियार
देश में साइबर अपराध अब केवल तकनीक के दुरुपयोग का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह आम नागरिकों की मेहनत की कमाई, बैंकिंग व्यवस्था की सुरक्षा और सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता के सामने गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। प्रतापगढ़ से देशभर में कथित तौर पर 5 अरब रुपये की साइबर ठगी के मामले में 53 आरोपियों की गिरफ्तारी की खबर इस खतरे की भयावहता को उजागर करती है। यदि जांच में सामने आए आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह स्पष्ट होगा कि साइबर अपराधियों ने लोगों के भरोसे को ही ठगी का हथियार बना लिया है।
इस मामले में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि किसान सम्मान निधि और बैंक खाते की केवाईसी जैसे विषयों का इस्तेमाल लोगों को अपने जाल में फंसाने के लिए किए जाने का आरोप है। किसान सरकारी सहायता पाने की उम्मीद में और सामान्य नागरिक बैंकिंग सेवाएं बाधित होने के डर से अनजान फोन कॉल पर भरोसा कर बैठते हैं। अपराधी इसी मनोवैज्ञानिक दबाव का फायदा उठाकर गोपनीय जानकारी हासिल करने की कोशिश करते हैं। सरकारी योजनाओं और बैंकिंग प्रक्रियाओं के नाम पर होने वाली ठगी इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि इससे नागरिकों का संस्थागत व्यवस्था पर भरोसा कमजोर पड़ता है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा चिंताजनक पक्ष बेरोजगार लोगों के बैंक खातों के कथित इस्तेमाल से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, लोगों को लालच देकर उनके नाम पर खाते खुलवाए जाते थे या किराये पर खाते लेकर ठगी की रकम का लेनदेन किया जाता था। ऐसे खाते साइबर अपराधियों के लिए धन के स्रोत और वास्तविक लाभार्थियों के बीच पर्दा बन सकते हैं। कई बार खाताधारक अपनी भूमिका और उसके कानूनी परिणामों को पूरी तरह समझे बिना इस जाल में फंस जाते हैं। इसलिए युवाओं को जागरूक करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी वित्तीय संस्थानों की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना भी है।
प्रतापगढ़ के कुंडा, रानीगंज और देहात क्षेत्रों से 53 आरोपियों की गिरफ्तारी को जांच की दिशा में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा सकता है। लेकिन किसी भी बड़े साइबर अपराध का पर्दाफाश केवल गिरफ्तारियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जांच एजेंसियों को यह पता लगाना होगा कि कथित नेटवर्क किन-किन राज्यों में सक्रिय था, ठगी की रकम कहां से आई और किन खातों के माध्यम से आगे भेजी गई। साथ ही, पीड़ितों की पहचान, धन की बरामदगी और दोषियों के विरुद्ध प्रभावी कानूनी कार्रवाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
करीब 5 अरब रुपये की ठगी का आंकड़ा अपने आप में बड़ा है, लेकिन इस राशि की प्रकृति और आधिकारिक पुष्टि भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि रकम कुल शिकायतों में दर्ज नुकसान को दर्शाती है, संदिग्ध लेनदेन को या जांच में प्रमाणित ठगी को। तथ्यों की स्पष्टता से ही जनता तक सही जानकारी पहुंचेगी और जांच की विश्वसनीयता बनी रहेगी।
साइबर अपराध से निपटने की जिम्मेदारी केवल पुलिस या बैंक की नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों, दूरसंचार कंपनियों, बैंकों तथा डिजिटल भुगतान संस्थानों को मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिसमें संदिग्ध खातों की समय रहते पहचान हो सके और शिकायत मिलने पर पीड़ित को त्वरित सहायता मिले। गांवों और कस्बों में जागरूकता अभियान चलाना भी आवश्यक है, ताकि किसान, मजदूर, बुजुर्ग और बेरोजगार युवा किसी अनजान कॉल पर अपनी बैंकिंग जानकारी साझा न करें।
समाज को भी यह समझना होगा कि बैंक खाते को किसी दूसरे व्यक्ति को किराये पर देना या उसके माध्यम से धन का लेनदेन कराना गंभीर कानूनी जोखिम पैदा कर सकता है। थोड़े से लालच में उठाया गया कदम किसी व्यक्ति को बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। वहीं, प्रशासन को ऐसे लोगों के विरुद्ध कार्रवाई करते समय उनकी वास्तविक भूमिका और परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच भी सुनिश्चित करनी चाहिए।

