डॉ मनोज कुमार तिवारी

वरिष्ठ परामर्शदाता

एआरटीसी, एसएस हॉस्पिटल आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी

लिव इन रिलेशनशिप एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दो वयस्क बिना किसी औपचारिक या कानूनी विवाह के पति-पत्नी की तरह एक ही छत के नीचे साथ रहते हैं और आपस में शारिरिक सम्बन्ध बनाते हैं।

मुख्य विशेषताएं:-

बिना विवाह के साथ रहना:- इसमें जोड़े पारंपरिक या कानूनी शादी के बंधन में बंधे बिना एक साथ जीवन गुजारते हैं।

पारस्परिक सहमति:- यह रिश्ता पूरी तरह से दोनों वयस्कों की मर्जी व आपसी सहमति पर आधारित होता है।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता:- इसमें पारंपरिक शादी की तुलना में व्यक्तिगत स्वायत्तता और आज़ादी अधिक होता है।

विवाह की प्रकृति:- हर साथ रहना लिव-इन रिलेशनशिप नहीं कहलाता है इसके लिए रिश्ता सिर्फ सामान्य डेटिंग नहीं, बल्कि विवाह की प्रकृति जैसा होना जरूरी है।

शर्तें :-

वयस्कता:- दोनों की उम्र शादी के कानूनी योग्य होनी चाहिए (लड़की की उम्र कम से कम 18 वर्ष और लड़के की उम्र 21 वर्ष होनी चाहिए)।

सहमति :- दोनों का रिश्ता पूरी तरह से आपसी सहमति से होना चाहिए, किसी दबाव, छल कपट या जबरदस्ती नहीं होना चाहिए।

वैवाहिक स्थिति:- दोनों पहले से किसी अन्य व्यक्ति के साथ कानूनी रूप से विवाहित नहीं होने चाहिए। दोनों को अविवाहित या तलाकशुदा होना चाहिए।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार, भारत के बड़े शहरों में लिव इन रिलेशनशिप में साथ रहने वालों का प्रतिशत 5 -11% होने का अनुमान है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब हर 2 में से 1 व्यक्ति शादी से पहले लिव-इन रिलेशनशिप में रहने को सही मानते हैं।

कानूनी अधिकार :- दुनिया के अनेक देशों में लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता प्राप्त है किंतु भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर कोई विशेष अधिनियम नहीं है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत बालिगों को अपनी मर्जी से साथ रहने की छूट है। घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 2 एफ के तहत 'विवाह की प्रकृति जैसे रिश्ते' को शामिल किया गया है। इसके आधार पर यदि रिश्ता लंबे समय तक चले, तो महिला को घरेलू हिंसा या भरण-पोषण का अधिकार मिल सकता है। लिव-इन रिलेशनशिप में रहने से उत्पन्न हुए बच्चों को माता-पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार प्राप्त होता है।

सकारात्मक प्रभाव/लाभ:-

एक दूसरे को समझने का अवसर मिलता है:- शादी से पहले एक-दूसरे की आदतों, स्वभाव और विचारों को गहराई से समझने का मौका मिलता है।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता:- सामाजिक या पारिवारिक दबाव के बिना अपनी मर्जी से जीवन जीने की आजादी मिलती है।

कैरियर व तालमेल:- बिना किसी औपचारिक पारिवारिक या कानूनी बाध्यता के दोनों व्यक्ति अपने कैरियर पर ध्यान दे सकते हैं व जिम्मेदारियां आपस में बाँट सकते हैं।

आसान अलगाव:- यदि आपसी तालमेल न बैठे तो कानूनी और लंबे तलाक की प्रक्रिया से गुजरे बिना अलग होना आसान होता है।

नकारात्मक प्रभाव/हानियाँ:-

सामाजिक कलंक:- पारंपरिक समाजों में आज भी लिव-इन रिलेशनशिप को अच्छा नहीं माना जाता है, जिससे सामाजिक आलोचना का सामना करना पड़ता है।

कानूनी अस्पष्टता:- शादी की तरह इसमें संपत्ति के अधिकार, उत्तराधिकार व गुजारा भत्ता को लेकर कानून पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

भावनात्मक असुरक्षा:- प्रतिबद्धता की कमी या भविष्य को लेकर अनिश्चितता के कारण कई बार रिश्ता टूटने पर गहरा मानसिक आघात पहुंचता है।

बच्चों पर असर:- यदि ऐसे संबंधों में बच्चे होते हैं, तो उन्हें सामाजिक और भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

लिव इन रिलेशन का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव-

सकारात्मक प्रभाव:-

भावनात्मक सहारा:- एक-दूसरे के साथ रहने से अकेलापन कम होता है और कठिन समय में भावनात्मक मजबूती मिलती है।

बेहतर समझ:- शादी जैसे बड़े बंधन में बंधने से पहले एक-दूसरे की आदतों, स्वभाव और विचारों को करीब से जानने का मौका मिलता है, जिससे मानसिक दबाव कम होता है।

तनाव में कमी:- यदि रिश्ता प्यार और सम्मान से भरा हो, तो शरीर में ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन बढ़ते हैं, जो तनाव और चिंता को कम करने में मदद करते हैं।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता:- इसमें जोड़े अपनी मर्जी से तालमेल बिठाते हैं, जिससे कई बार पारंपरिक शादी के शुरुआती दबावों की तुलना में मानसिक सुकून मिलता है।

नकारात्मक प्रभाव:-

सामाजिक व पारिवारिक दबाव:- भारत में लिव इन रिश्तों को लेकर सामाजिक स्वीकार्यता की कमी है। परिवार की नाराजगी, समाज का बिरोध, लोगों के ताने और अलगाव का डर अक्सर गंभीर तनाव और अवसाद का कारण बनता है।

अनिश्चितता की भावना:- रिश्ते में भविष्य को लेकर स्पष्टता न होने या प्रतिबद्धता की कमी से असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है।

तालमेल न बैठना:- यदि रिश्ते में लगातार कलह, असहमति या भावनात्मक शोषण हो तो यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह होता है।

लिव इन रिलेशनशिप टूटने का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:-

लिविंग-इन रिलेशनशिप टूटने का मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा व बहुआयामी प्रभाव पड़ता है। सम्बंध टूटने की स्थिति में स्त्रियों को मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ पुरुषों से अधिक होती हैं।

तनाव व अवसाद:- लिव इन रिश्ता टूटने के बाद शुरुआती महीनों में तनाव और अवसाद का खतरा काफी बढ़ जाता है।

अकेलापन:- लंबे समय तक एक साथ रहने के बाद अचानक अकेलेपन का अहसास मन को अंदर से तोड़ता है, जिससे हीन भावना पैदा होता है।

नींद की समस्या:- अत्यधिक सोचने, घबराहट और दिल टूटने के दर्द के कारण अनिद्रा या सोने के पैटर्न में गड़बड़ी होती है।

अनियमित दिनचर्या:- संबंध टूटने से व्यक्ति की दिनचर्या गड़बड़ हो जाती है जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती खड़ा करता है

दैनिक कामकाज पर असर:- मानसिक उलझन के कारण काम, पढ़ाई या रोजमर्रा के कामों में ध्यान केंद्रित करना मुश्किल होता है।

पहचान का संकट:- जब लिव इन रिश्ता लंबे समय तक रहता है, तो उसके खत्म होने पर व्यक्ति को समझ नहीं पाता कि अकेले पहचान कैसे बनाए।

नशे:- दर्द से बचने के लिए कुछ लोग सिगरेट, शराब या अन्य नशीले पदार्थों का सहारा लेते हैं, जो स्थिति को और बिगाड़ देता है।

बचाव के उपाय:-

भावनाओं को स्वीकार करें:- दर्द, गुस्सा या उदासी महसूस होना स्वाभाविक है, इन्हें दबाने के बजाय स्वीकार करें। डायरी लिखना फायदेमंद होता है।

सहारा लें:- अपने परिवार, भरोसेमंद दोस्तों या करीबी लोगों से बातचीत करें इससे दिल का बोझ हल्का होता है।

प्रोफेशनल मदद लें:- यदि अवसाद या एंग्जाइटी कंट्रोल से बाहर हो जाए, तो मनोवैज्ञानिक परामर्श लें।

खुद के लिए समय निकालें:- अपने शौक, फिटनेस या कैरियर पर ध्यान केंद्रित करें और दिनचर्या को दोबारा नियमित करने की कोशिश करें।

भारत में लिव इन रिलेशन से संबंधित कोई स्पष्ट कानून नहीं है लिव इन रिलेशन पूरी तरह से दो बालिग व्यक्तियों के सहमति पर आधारित है। इसमें जोखिम अधिक तथा मानसिक संतुष्टि कम है इसमें मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का भी जोखिम अधिक होने से अत्यंत सावधानी की आवश्यकता है।