नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के चार नेताओं के पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने को लेकर तीखी टिप्पणी की है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए काटजू ने दावा किया कि पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने से अभिजीत दीपके, सौरभ दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे का सार्वजनिक जीवन में करियर प्रभावित हो सकता है। उन्होंने कहा कि जनता की नजर में इन नेताओं की विश्वसनीयता कम हो सकती है, क्योंकि वे सार्वजनिक प्रदर्शनों में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित होने की स्थिति में आ सकते हैं। दूसरी ओर, काटजू ने आइसा की छात्रनेता नेहा बोरा की तारीफ की, जिन्होंने कथित तौर पर पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया। उनके बयान के बाद शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और कानूनी शर्तों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

काटजू बोले- पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर से जनता के बीच विश्वसनीयता पर असर पड़ सकता है। मार्कंडेय काटजू ने अपनी पोस्ट में चारों नेताओं के नाम लेते हुए कहा कि पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के बाद उनके लिए सार्वजनिक प्रदर्शनों में शामिल होना मुश्किल हो सकता है। उनके अनुसार, यदि पुलिस को लगता है कि संबंधित व्यक्ति ने शांति भंग की है या बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन किया है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। काटजू ने इस स्थिति को नेताओं की सार्वजनिक छवि से जोड़ते हुए दावा किया कि जनता उन्हें कमजोर समझ सकती है। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए चारों नेताओं को 'गैंग ऑफ फोर' भी कहा। हालांकि, सार्वजनिक जीवन में उनके करियर के समाप्त होने का दावा काटजू की व्यक्तिगत राय है, न कि कोई स्थापित तथ्य। पीस बॉन्ड की वास्तविक शर्तें और उनके कानूनी परिणाम संबंधित आदेश तथा लागू कानून के आधार पर तय होते हैं।

नेहा बोरा की तारीफ, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार का किया जिक्र। काटजू ने आइसा की छात्रनेता नेहा बोरा की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह उनके फैसले का सम्मान करते हैं। उनके मुताबिक, नेहा बोरा ने पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने से इसलिए इनकार किया क्योंकि वह शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने को अपना संवैधानिक अधिकार मानती हैं। काटजू ने इस संदर्भ में अपने विचार रखते हुए कहा कि विरोध दर्ज कराने और अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखने का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। हालांकि, इन अधिकारों पर कानून के तहत उचित प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं। ऐसे में किसी पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने या उससे इनकार करने के कानूनी परिणाम संबंधित मामले की परिस्थितियों और आदेश की शर्तों पर निर्भर करते हैं।

सौरभ दास और आशुतोष रांका की रिहाई के बाद बयान चर्चा में, मुचलके पर छोड़े जाने का दिया गया आदेश। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दिल्ली में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने सीजेपी के नेता सौरभ दास और आशुतोष रांका को रिहा करने का आदेश दिया था। दोनों ने हलफनामा दिया कि वे शांति भंग नहीं करेंगे और जंतर-मंतर को अधिसूचित धरना स्थल घोषित किए जाने की स्थिति के संबंध में निर्धारित शर्तों का पालन करेंगे। उन्हें 50-50 हजार रुपये के निजी मुचलके और जमानतदार पेश करने का निर्देश दिया गया। मुचलके की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सहायक पुलिस आयुक्त रितु राज ने तिहाड़ जेल से उनकी रिहाई का आदेश दिया। इसी घटनाक्रम के बीच काटजू की टिप्पणी सामने आई, जिसमें उन्होंने पीस बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने वाले नेताओं की आलोचना और नेहा बोरा के फैसले की प्रशंसा की। यह पूरा मामला राजनीतिक विरोध, सार्वजनिक प्रदर्शन और कानूनी शर्तों के बीच संतुलन को लेकर नई बहस का विषय बन गया है।