यूथ इंडिया

हृदय रोग आज दुनिया भर में गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हैं। भारत में भी दिल से जुड़ी बीमारियों के मामले लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, देश में होने वाली प्रत्येक चार मौतों में से लगभग एक का संबंध हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों से है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कई बार इन बीमारियों के शुरुआती संकेत स्पष्ट नहीं होते और व्यक्ति को अपनी गंभीर स्थिति का पता तब चलता है, जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है। ऐसे में समय पर जांच, जोखिम की पहचान और जीवनशैली में जरूरी बदलाव बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

हृदय रोगों के खतरे को समझने और समय रहते सावधानी बरतने में आधुनिक चिकित्सा तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन्हीं तकनीकों में एक है कैल्शियम स्कोर टेस्ट, जिसे कोरोनरी आर्टरी कैल्शियम (सीएसी) टेस्ट भी कहा जाता है। यह जांच हृदय तक रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में जमा कैल्शियम की मात्रा का आकलन करती है। इसके माध्यम से डॉक्टर को यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी व्यक्ति में कोरोनरी आर्टरी डिजीज यानी हृदय की धमनियों से जुड़ी बीमारी का जोखिम कितना है।

इस जांच की उपयोगिता को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि हृदय की धमनियां किस तरह काम करती हैं और उनमें रुकावट पैदा होने की प्रक्रिया कैसे शुरू होती है। हृदय को लगातार रक्त और ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। कोरोनरी धमनियां यह काम करती हैं। जब इन धमनियों की भीतरी दीवारों पर वसा, कोलेस्ट्रॉल और अन्य पदार्थ जमा होने लगते हैं, तो प्लाक बनने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। समय के साथ इस प्लाक में कैल्शियम जमा हो सकता है, जिससे वह सख्त होने लगता है। इस स्थिति को धमनियों में कैल्सिफिकेशन कहा जाता है।

धमनियों में प्लाक जमा होने से उनका अंदरूनी रास्ता संकरा हो सकता है और हृदय तक रक्त पहुंचने में बाधा उत्पन्न हो सकती है। कुछ परिस्थितियों में प्लाक के फटने और वहां रक्त का थक्का बनने से रक्त प्रवाह अचानक बाधित हो सकता है, जिससे हार्ट अटैक का खतरा पैदा होता है। हालांकि, हर प्रकार के प्लाक में कैल्शियम मौजूद नहीं होता और केवल कैल्शियम स्कोर के आधार पर धमनियों में रुकावट की वास्तविक गंभीरता का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद यह जांच हृदय रोगों के जोखिम को समझने में उपयोगी जानकारी प्रदान करती है।

कैल्शियम स्कोर टेस्ट एक विशेष प्रकार के कंप्यूटेड टोमोग्राफी यानी सीटी स्कैन की मदद से किया जाता है। इसमें हृदय की धमनियों में जमा कैल्शियम का पता लगाने के लिए विशेष इमेजिंग तकनीक का उपयोग होता है। सामान्यतः यह जांच कुछ ही मिनटों में पूरी हो जाती है। इसके बाद प्राप्त तस्वीरों के आधार पर कैल्शियम की मात्रा का आकलन करके एक स्कोर निर्धारित किया जाता है। इस स्कोर को व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों और अन्य जोखिम कारकों के साथ मिलाकर समझा जाता है।

आमतौर पर कैल्शियम स्कोर शून्य होने का अर्थ है कि जांच में कोरोनरी धमनियों में कैल्सिफाइड प्लाक नहीं दिखाई दिया। कम स्कोर का मतलब धमनियों में कैल्शियम की मात्रा कम होना है, जबकि अधिक स्कोर अधिक कैल्सिफाइड प्लाक और सामान्यतः हृदय रोग के बढ़े हुए जोखिम का संकेत दे सकता है। लेकिन शून्य स्कोर होने के बावजूद हृदय रोग की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाती, क्योंकि कुछ प्रकार का प्लाक इस जांच में दिखाई नहीं देता। इसी तरह अधिक स्कोर आने का अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को तत्काल हार्ट अटैक होने वाला है।

कैल्शियम स्कोर टेस्ट हर व्यक्ति के लिए आवश्यक नहीं होता। इसका उपयोग विशेष रूप से उन लोगों में उपयोगी हो सकता है, जिनमें हृदय रोग का जोखिम पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और जिनके लिए डॉक्टर को यह निर्णय लेने में सहायता चाहिए कि कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा सहित बचाव के उपाय कितने जरूरी हैं। उम्र, परिवार में कम उम्र में हृदय रोग का इतिहास, धूम्रपान, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल का बढ़ा हुआ स्तर ऐसे कारक हैं, जिनके आधार पर डॉक्टर किसी व्यक्ति के जोखिम का आकलन कर सकते हैं। हालांकि, इन कारकों में से किसी एक के मौजूद होने मात्र से यह जांच कराना अनिवार्य नहीं हो जाता।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस जांच को कराने का निर्णय व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। जिन लोगों में पहले से हृदय रोग का निदान हो चुका है, जिन्हें हार्ट अटैक हो चुका है या जिनमें हृदय रोग के लक्षण मौजूद हैं, उनके लिए यह जांच हमेशा सबसे उपयुक्त विकल्प नहीं होती। सीने में दर्द, सांस फूलना या अन्य संदिग्ध लक्षण होने पर चिकित्सक जरूरत के अनुसार दूसरी जांचों की सलाह दे सकते हैं। ऐसे मामलों में केवल कैल्शियम स्कोर के परिणाम पर निर्भर रहना उचित नहीं है।

इस जांच की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें आमतौर पर किसी प्रकार का इंजेक्शन या कंट्रास्ट डाई देने की जरूरत नहीं पड़ती। फिर भी यह एक्स-रे आधारित सीटी स्कैन है, इसलिए इसमें थोड़ी मात्रा में विकिरण का सामना करना पड़ता है। इसका जोखिम सामान्यतः कम होता है, लेकिन बिना चिकित्सकीय आवश्यकता के बार-बार जांच कराना उचित नहीं माना जाता। गर्भावस्था की संभावना होने पर जांच से पहले डॉक्टर को इसकी जानकारी देना जरूरी है। इसके अलावा जांच के परिणामों को सही संदर्भ में समझना भी आवश्यक है, ताकि किसी व्यक्ति में अनावश्यक चिंता या गलत आश्वासन की स्थिति पैदा न हो।

हृदय रोगों से बचाव के लिए केवल जांच पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, धूम्रपान से दूरी और रक्तचाप, रक्त शर्करा तथा कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना दीर्घकालिक हृदय स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। जिन लोगों में जोखिम अधिक है, उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार आवश्यक दवाएं और नियमित स्वास्थ्य जांच करानी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति का कैल्शियम स्कोर अधिक आता है, तो डॉक्टर उसके समग्र जोखिम का आकलन करके आगे की जांच और उपचार की योजना बना सकते हैं।

हृदय रोगों के मामले में जागरूकता और समय पर चिकित्सकीय परामर्श की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कैल्शियम स्कोर टेस्ट एक उपयोगी साधन है, लेकिन इसे हृदय रोग का अंतिम या संपूर्ण निदान नहीं समझना चाहिए। इसका सही लाभ तभी मिलता है, जब जांच का चुनाव उचित व्यक्ति के लिए किया जाए और उसके परिणामों के आधार पर चिकित्सकीय मार्गदर्शन में आगे की रणनीति तय की जाए। दिल की सेहत की रक्षा के लिए सबसे प्रभावी रास्ता है—जोखिम को समय रहते पहचानना, नियमित जांच कराना और स्वस्थ जीवनशैली को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना।