भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने संविधान को केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति निरंतर जिम्मेदारी बताया। भारत मंडपम में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने डॉ. भीमराव आंबेडकर के संवैधानिक योगदान को याद करते हुए कहा कि उनकी विरासत हमेशा अमर रहेगी। उन्होंने संविधान के मूल्यों को अपनाने और उनका पालन करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
CJI सूर्यकांत ने अपने संबोधन में डॉ. आंबेडकर के विचारों और उनके संघर्षों का उल्लेख किया। उन्होंने महाड़ सत्याग्रह से मिलने वाले सबक को याद करते हुए कहा कि यह आंदोलन सामाजिक समानता, सम्मान और अधिकारों की लड़ाई का महत्वपूर्ण उदाहरण है। आंबेडकर ने समाज में व्याप्त भेदभाव को समाप्त करने और सभी नागरिकों को समान अधिकार दिलाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
मुख्य न्यायाधीश ने समानता के मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए सवाल उठाया कि क्या केवल कानून बनाकर समाज में वास्तविक समानता स्थापित की जा सकती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कानूनी अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक सोच और व्यवहार में भी बदलाव जरूरी है। समानता का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है, जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति दूसरे के अधिकारों और सम्मान का आदर करे।
उन्होंने कहा कि संविधान के आदर्शों को वास्तविक जीवन में लागू करना प्रत्येक नागरिक और संस्थान की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र, न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल्यों को मजबूत बनाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। CJI सूर्यकांत के इस संबोधन ने डॉ. आंबेडकर की विचारधारा और सामाजिक न्याय के महत्व को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।



