डॉ. विजय गर्ग

हम 21वीं सदी में रह रहे हैं, जहाँ मानव ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अद्भुत प्रगति की है। मनुष्य चंद्रमा और मंगल तक पहुँच चुका है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के माध्यम से नई संभावनाओं की खोज कर रहा है और चिकित्सा विज्ञान ने अनेक गंभीर बीमारियों के उपचार में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। इसके बावजूद समाज में अंधविश्वास, भ्रम और निराधार मान्यताओं का प्रचलन आज भी जारी है। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि वैज्ञानिक प्रगति के इस युग में भी मनुष्य अंधविश्वासों से पूरी तरह मुक्त क्यों नहीं हो पाया है?

अंधविश्वासों की जड़ें

अंधविश्वासों की जड़ें अक्सर अज्ञानता, भय, असुरक्षा और अधूरी जानकारी में होती हैं। प्राचीन समय में जब मनुष्य के पास प्राकृतिक घटनाओं को समझने के लिए वैज्ञानिक ज्ञान नहीं था, तब वह बिजली चमकने, ग्रहण लगने, बीमारियाँ फैलने और प्राकृतिक आपदाओं को अलौकिक शक्तियों से जोड़ देता था। समय के साथ इनमें से कई धारणाएँ लोकविश्वास और परंपराओं का रूप ले गईं।

आज विज्ञान ने ऐसी अनेक घटनाओं की स्पष्ट व्याख्या कर दी है, लेकिन पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही मान्यताओं को बदलना आसान नहीं होता। कई लोग बिना सोचे-समझे उन्हीं बातों पर विश्वास करते रहते हैं, जिन्हें उन्होंने बचपन से अपने परिवार या समाज में सुना होता है।

पढ़े-लिखे लोग भी अंधविश्वास से मुक्त नहीं

यह समझना गलत है कि अंधविश्वास केवल अशिक्षित लोगों में ही पाया जाता है। कई बार उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी ज्योतिष, कुंडली, शुभ-अशुभ समय, अंकों के प्रभाव और निराधार धारणाओं पर विश्वास करते हैं।

इसका मुख्य कारण यह है कि डिग्री प्राप्त करना और वैज्ञानिक सोच विकसित करना दो अलग-अलग बातें हैं। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल जानकारी एकत्र करना नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने, तथ्यों की जाँच करने और तर्क के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है।

भय और असुरक्षा का फायदा

मानव जीवन में बीमारी, बेरोजगारी, आर्थिक संकट, पारिवारिक समस्याएँ और भविष्य की अनिश्चितता जैसी परिस्थितियाँ आती रहती हैं। ऐसे समय में लोग मानसिक सहारे और त्वरित समाधान की तलाश करते हैं। कुछ लोग इस मानसिक कमजोरी का फायदा उठाकर चमत्कारों, तंत्र-मंत्र, जादू-टोने और अलौकिक शक्तियों के नाम पर लोगों को गुमराह करते हैं।

कई बार बीमार व्यक्ति को डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय झाड़-फूँक या अवैज्ञानिक उपचारों में उलझा दिया जाता है। इससे कीमती समय और धन बर्बाद होता है तथा कई बार मरीज की जान भी खतरे में पड़ जाती है। इसलिए स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का समाधान योग्य चिकित्सक की सलाह और वैज्ञानिक उपचार के माध्यम से ही करना चाहिए।

सोशल मीडिया ने बढ़ाई चुनौती

डिजिटल युग में जानकारी तक पहुँच आसान हो गई है, लेकिन गलत सूचनाओं का प्रसार भी बहुत तेज हो गया है। व्हाट्सऐप, फेसबुक, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के माध्यम से अफवाहें, चमत्कारी इलाज के दावे और निराधार भविष्यवाणियाँ तेजी से फैलती हैं।

कई लोग किसी संदेश की सत्यता जाँचे बिना उसे आगे भेज देते हैं। इस तरह अंधविश्वास आधुनिक तकनीक की सहायता से और तेजी से फैलता है। हमें किसी भी जानकारी को सच मानने से पहले उसके स्रोत, प्रमाण और वैज्ञानिक आधार की जाँच करनी चाहिए।

वैज्ञानिक सोच ही वास्तविक समाधान

अंधविश्वास को समाप्त करने के लिए वैज्ञानिक सोच और तर्कसंगत दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करना बहुत आवश्यक है। वैज्ञानिक सोच का अर्थ हर बात का विरोध करना नहीं, बल्कि किसी भी दावे को बिना प्रमाण स्वीकार न करना है। किसी घटना के पीछे कारण खोजना, प्रश्न पूछना, प्रयोग करना और परिणामों की जाँच करना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रमुख आधार हैं।

हमें यह भी समझना चाहिए कि सांस्कृतिक परंपराएँ और अंधविश्वास एक जैसी चीजें नहीं हैं। त्योहार, रीति-रिवाज, लोकगीत और पारिवारिक परंपराएँ समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हो सकती हैं। लेकिन जब कोई धारणा मानव स्वास्थ्य, सुरक्षा, स्वतंत्रता या सामाजिक समानता को नुकसान पहुँचाती है, तो उसकी तर्क और विज्ञान के आधार पर जाँच करना आवश्यक है।

शिक्षण संस्थानों और शिक्षकों की भूमिका

स्कूल और कॉलेज वैज्ञानिक चेतना विकसित करने के सबसे महत्वपूर्ण केंद्र हैं। विद्यार्थियों को केवल विज्ञान के सिद्धांत याद करवाने के बजाय प्रयोगों, अवलोकनों और तार्किक चर्चाओं के माध्यम से सीखने के अवसर देने चाहिए।

शिक्षकों को बच्चों में प्रश्न पूछने की आदत विकसित करनी चाहिए। यदि कोई बच्चा किसी प्रचलित मान्यता के बारे में सवाल करता है, तो उसे चुप कराने के बजाय उसके प्रश्न का उत्तर तथ्यों और तर्क के साथ देना चाहिए। विज्ञान मेले, प्रयोगशालाएँ, वैज्ञानिक प्रदर्शनियाँ और जन-जागरूकता अभियान भी इस दिशा में प्रभावशाली साबित हो सकते हैं।

युवा पीढ़ी से उम्मीद

युवाओं में समाज में परिवर्तन लाने की अपार क्षमता है। उन्हें चाहिए कि वे प्रत्येक जानकारी को तर्क की कसौटी पर परखें और गलत धारणाओं का विरोध समझदारी से करें। किसी व्यक्ति की धार्मिक या सांस्कृतिक भावनाओं का अपमान किए बिना भी अंधविश्वासों के विरुद्ध जागरूकता पैदा की जा सकती है।

निष्कर्ष

विज्ञान और तकनीक की प्रगति तभी सार्थक बनती है, जब इसके साथ मानव की सोच भी तर्कसंगत और वैज्ञानिक बने। केवल स्मार्टफोन का उपयोग करना, इंटरनेट चलाना या उच्च डिग्रियाँ प्राप्त करना आधुनिक होने की निशानी नहीं है। वास्तविक आधुनिकता प्रश्न पूछने, सत्य की खोज करने और प्रमाणों के आधार पर निर्णय लेने में है।

हमें अपने बच्चों को भय और अंधविश्वास की विरासत देने के बजाय ज्ञान, तर्क और वैज्ञानिक चेतना की विरासत देनी चाहिए। जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अंधविश्वास के स्थान पर तर्क और अज्ञानता के स्थान पर ज्ञान को महत्व देगा, तभी एक स्वस्थ, जागरूक और प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव होगा।

याद रखिए, वैज्ञानिक सोच मनुष्य को केवल प्रश्न पूछना ही नहीं सिखाती, बल्कि सत्य को पहचानने का साहस भी देती है।

डॉ. विजय गर्ग

सेवानिवृत्त प्रिंसिपल | प्रख्यात वैज्ञानिक

स्ट्रीट कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107

मोबाइल: 9465682110