शरद कटियार
संपादकीय
लखनऊ के सआदतगंज क्षेत्र में पार्किंग विवाद के बाद एक ही परिवार के तीन लोगों की हत्या ने न केवल राजधानी की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि समाज में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति की भयावह तस्वीर भी सामने रखी है। शिवाजी तिवारी, शिवेंद्र तिवारी और सुयश तिवारी की मौत से एक परिवार उजड़ गया। पीछे छूटे परिजनों का दर्द उस समय और गहरा हो गया, जब मृतक की बेटी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भावुक अपील करते हुए कहा, ‘योगी जी, आपकी बेटी अनाथ हो गई।’ यह केवल एक बेटी की पुकार नहीं, बल्कि उस भरोसे की परीक्षा भी है, जो आम नागरिक सरकार और कानून-व्यवस्था से करता है।
पार्किंग जैसे सामान्य विवाद का तीन हत्याओं तक पहुंच जाना कई बुनियादी सवाल पैदा करता है। क्या मामूली कहासुनी का जवाब गोलियों से दिया जाने लगा है? क्या लोगों के भीतर कानून का भय कमजोर पड़ रहा है? और यदि किसी विवाद के पहले से चलने की बात सामने आ रही है, तो यह भी जांच का विषय है कि उसे समय रहते सुलझाने के लिए क्या कदम उठाए गए थे। इन सवालों के जवाब केवल बयानबाजी से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने से ही मिल सकते हैं।
एक बेटी की पुकार और व्यवस्था की जिम्मेदारी
किसी परिवार के तीन सदस्यों की एक साथ हत्या हो जाना ऐसी त्रासदी है, जिसकी भरपाई किसी आर्थिक सहायता से नहीं की जा सकती। मृतक की बेटी की मांग कि आरोपियों के घर पर बुलडोजर चलाया जाए, उसके असहनीय दुख और न्याय पाने की बेचैनी को सामने लाती है। जब किसी परिवार से उसके अपने छिन जाते हैं, तब आक्रोश स्वाभाविक है। ऐसे समय में शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि पीड़ितों को भरोसा देना भी है कि वे अकेले नहीं हैं।
हालांकि, न्याय की मांग और दंडात्मक कार्रवाई के बीच कानून की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। किसी अपराध के आरोपी के विरुद्ध कार्रवाई साक्ष्यों, कानून और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए। यदि संबंधित भवन में अवैध निर्माण पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन किसी भी कार्रवाई का आधार बदले की भावना नहीं, बल्कि कानून होना चाहिए। बुलडोजर चलना या न चलना अपने आप में न्याय का प्रमाण नहीं है; वास्तविक कसौटी यह है कि अपराधियों को विधिसम्मत सजा मिले और निर्दोष के अधिकार सुरक्षित रहें।
पुलिस की जवाबदेही तय होना जरूरी
इस मामले में सआदतगंज थाना प्रभारी और चौकी प्रभारी को निलंबित किए जाने की कार्रवाई पुलिस की भूमिका की जांच के महत्व को रेखांकित करती है। यदि दोनों पक्षों के बीच पहले से विवाद था और पुलिस को इसकी जानकारी थी, तो यह पता लगाना जरूरी है कि शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, संभावित खतरे का आकलन किया गया या नहीं और किसी स्तर पर लापरवाही तो नहीं बरती गई।
निलंबन को अंतिम जवाबदेही नहीं माना जा सकता। विभागीय जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और यदि लापरवाही प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई भी की जानी चाहिए। इसके साथ ही, घटना के प्रत्यक्ष साक्ष्यों को सुरक्षित रखना, गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और अभियोजन को मजबूत बनाना आवश्यक है। पुलिस की विश्वसनीयता तभी कायम होगी, जब जांच में पारदर्शिता दिखाई देगी और जिम्मेदार लोगों को उनके कृत्यों के अनुसार जवाबदेह बनाया जाएगा।
मुआवजा और नौकरी राहत हैं, न्याय का विकल्प नहीं
उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की ओर से पीड़ित परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने, मृतक की बेटी की पढ़ाई का खर्च उठाने और सुरक्षा उपलब्ध कराने की घोषणा राहत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। ऐसी सहायता उस परिवार को संभलने का अवसर दे सकती है, जिसकी दुनिया अचानक बदल गई है। लेकिन यह भी याद रखना होगा कि सरकारी नौकरी, आर्थिक सहायता और सुरक्षा व्यवस्था न्यायिक प्रक्रिया के विकल्प नहीं हैं।
पीड़ित परिवार को लंबे समय तक सहायता की जरूरत पड़ सकती है। बेटी की शिक्षा बाधित न हो, परिवार को किसी तरह का दबाव या धमकी न झेलनी पड़े और मुकदमे की पैरवी में उसे अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े—इन सभी पहलुओं पर प्रशासन को संवेदनशीलता के साथ ध्यान देना चाहिए। घोषणाओं का वास्तविक महत्व तभी है, जब वे समयबद्ध तरीके से जमीन पर उतरें।
कानून का भय अपराधियों में हो, आम नागरिकों में नहीं
लखनऊ की यह घटना एक व्यापक सामाजिक समस्या की ओर भी संकेत करती है। विवाद होना असामान्य नहीं, लेकिन विवाद का हिंसा में बदल जाना गंभीर चिंता का विषय है। कानून अपने हाथ में लेने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए पुलिस की सक्रियता, त्वरित शिकायत निस्तारण, स्थानीय स्तर पर संवाद और निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई जरूरी है। साथ ही, समाज को भी यह समझना होगा कि अहंकार, गुस्से और वर्चस्व की लड़ाई में हथियारों का इस्तेमाल किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि कई परिवारों के जीवन को तबाह करने वाला अपराध है।
सरकार के सामने चुनौती केवल इस मामले में आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने की नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की भी है। कानून-व्यवस्था की सफलता का आकलन केवल सख्त बयानों या त्वरित कार्रवाइयों से नहीं किया जा सकता। असली सफलता तब होगी, जब आम नागरिक बिना भय के जीवन जी सके, विवाद हिंसा तक न पहुंचें और पुलिस पर लोगों का भरोसा मजबूत हो।
लखनऊ के इस तिहरे हत्याकांड में पीड़ित बेटी की पुकार को राजनीतिक नारे तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह शासन-प्रशासन के लिए संवेदनशीलता, निष्पक्षता और जवाबदेही की परीक्षा है। परिवार को सुरक्षा मिले, दोषियों को कानून के अनुसार सजा मिले और किसी भी स्तर पर लापरवाही हुई हो तो उसकी जिम्मेदारी तय हो—यही न्याय का वास्तविक रास्ता है। बुलडोजर की कार्रवाई सुर्खियां बटोर सकती है, लेकिन न्याय की असली पहचान निष्पक्ष जांच, मजबूत अभियोजन और कानून के समान अनुपालन से ही होती है।

