- पशु आहार से दूध उत्पादन तक बढ़ी लागत ने बिगाड़ा डेयरी कारोबार का गणित।
- कंपनियों के मुनाफे पर दबाव तो पशुपालक भी परेशान।
- देश के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक उत्तर प्रदेश पर भी पड़ सकता है असर।
लखनऊ। देश के डेयरी बाजार में एक बार फिर कीमतों को लेकर हलचल तेज हो गई है। देश की प्रमुख डेयरी सहकारी संस्था अमूल ने घी और मक्खन की कीमतों में बढ़ोतरी कर डेयरी उद्योग के सामने खड़े लागत संबंधी दबाव को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। इस मूल्य वृद्धि के बाद अब बाजार की निगाहें पॉलीपैक यानी पैकेट दूध की कीमतों पर टिक गई हैं। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि दूध महंगा होगा या नहीं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि आखिर डेयरी उद्योग का पूरा आर्थिक गणित क्यों बदल रहा है और इस बदलाव का लाभ किसे मिल रहा है—किसान को, डेयरी कंपनियों को या फिर केवल बाजार को?
अमूल ने एक किलोग्राम घी के कार्टन की कीमत 630 रुपये से बढ़ाकर 680 रुपये कर दी है। 500 ग्राम शुद्ध घी का पैक 325 रुपये से बढ़कर 345 रुपये हो गया है। वहीं एक लीटर अमूल काउ घी की कीमत 695 रुपये से बढ़ाकर 735 रुपये कर दी गई है। मक्खन के 100 ग्राम पैक की कीमत 63 रुपये से 66 रुपये और 500 ग्राम पैक की कीमत 310 रुपये से बढ़ाकर 325 रुपये कर दी गई है। कंपनी की ओर से बढ़ती दूध उत्पादन और पशु आहार लागत को मूल्य संशोधन की प्रमुख वजह बताया गया है।
डेयरी कारोबार में घी और मक्खन केवल उपभोक्ता उत्पाद नहीं, बल्कि दूध की उपलब्धता और वसा की कीमतों के भी महत्वपूर्ण संकेतक हैं। दूध से क्रीम निकालकर घी और मक्खन तैयार किया जाता है। ऐसे में दूध की खरीद कीमत, फैट की उपलब्धता और उत्पादन लागत इन उत्पादों के मूल्य निर्धारण को प्रभावित करती है। हालांकि घी-मक्खन के महंगे होने का अर्थ यह नहीं है कि पैकेट दूध भी तत्काल महंगा हो जाएगा, लेकिन यदि दूध खरीदने की लागत, पशु आहार और प्रसंस्करण खर्च लगातार बढ़ते हैं तो डेयरी कंपनियों के सामने खुदरा कीमतों की समीक्षा करने का दबाव जरूर बन सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। भारत सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक राज्य है। वर्ष 2024-25 में देश के कुल दूध उत्पादन में प्रदेश की हिस्सेदारी 15.66 प्रतिशत रही। इसी अवधि में भारत का कुल दूध उत्पादन 247.87 मिलियन टन दर्ज किया गया।
प्रदेश में लाखों पशुपालक परिवारों की आजीविका दूध उत्पादन पर निर्भर है। गांवों से लेकर शहरों तक सहकारी समितियों, निजी डेयरी कंपनियों, दुग्ध संघों और स्थानीय दूध कारोबारियों का व्यापक नेटवर्क है। ऐसे में दूध की खरीद कीमतों और उत्पादन लागत में होने वाला बदलाव सीधे प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। उत्तर प्रदेश में डेयरी उद्योग की वास्तविक मजबूती केवल दूध उत्पादन की मात्रा से नहीं, बल्कि पशुपालक को मिलने वाले मूल्य, दूध के संग्रहण, शीतलीकरण, प्रसंस्करण और विपणन व्यवस्था से भी तय होती है।
डेयरी कारोबार से जुड़े संचालकों के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती लागत और बिक्री मूल्य के बीच संतुलन बनाए रखने की है। उनका कहना है कि दूध की खरीद कीमत के साथ बिजली, डीजल, कर्मचारियों का वेतन, पैकेजिंग, परिवहन, शीतलीकरण और मशीनों के रखरखाव पर होने वाला खर्च भी लगातार बढ़ रहा है। बाजार में प्रतिस्पर्धा इतनी अधिक है कि कंपनियों के लिए हर बार लागत बढ़ने पर दूध की कीमत बढ़ाना आसान नहीं होता। उपभोक्ता एक ओर उचित कीमत पर दूध चाहता है तो दूसरी ओर बाजार में कई ब्रांड और स्थानीय डेयरियां होने के कारण कंपनियों को अपने बिक्री मूल्य भी प्रतिस्पर्धी रखने पड़ते हैं।
डेयरी संचालकों के मुताबिक, यदि दूध खरीदने की लागत बढ़ती रहे और बिक्री मूल्य लंबे समय तक स्थिर रहे तो कारोबार का मुनाफा लगातार प्रभावित होता है। ऐसे में कीमतों में संशोधन केवल मुनाफा बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि कई परिस्थितियों में कारोबार की आर्थिक स्थिति बनाए रखने की जरूरत बन जाता है।
डेयरी उद्योग की दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर गांवों में दिखाई देती है। पशुपालक किसानों का कहना है कि अब एक दुधारू पशु को पालना पहले की तुलना में काफी महंगा हो गया है। हरा चारा, सूखा भूसा, खल, चोकर, दाना, मिनरल मिक्सचर और पशु चिकित्सा पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ा है। इसके अलावा श्रमिकों की मजदूरी और पशुओं की देखभाल पर भी अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है। पशुपालक के सामने चुनौती केवल दूध उत्पादन की नहीं है। पशु जब दूध देना बंद कर देता है, गर्भावस्था में होता है या उसकी दूध देने की क्षमता कम हो जाती है, तब भी उसके चारे और रखरखाव का खर्च जारी रहता है। ऐसे में किसान को पूरे वर्ष पशुपालन का खर्च उठाना पड़ता है, जबकि आमदनी दूध उत्पादन की मात्रा पर निर्भर रहती है।
किसानों का तर्क है कि जब बाजार में घी, मक्खन और अन्य दुग्ध उत्पादों के दाम बढ़ते हैं तो दूध उत्पादकों को भी उसका उचित लाभ मिलना चाहिए। यदि बढ़ती लागत का पूरा बोझ पशुपालक पर ही रहेगा तो छोटे और सीमांत पशुपालकों के लिए डेयरी व्यवसाय को लाभकारी बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा।
डेयरी उद्योग की मौजूदा स्थिति को तीन पक्षों के नजरिये से समझा जा सकता है। पहला पक्ष किसान है, जिसे पशु पालन की बढ़ती लागत के अनुरूप दूध का उचित खरीद मूल्य चाहिए। दूसरा पक्ष डेयरी कंपनी है, जिसे दूध खरीद, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन और वितरण की लागत निकालने के बाद कारोबार में उचित मुनाफा बनाए रखना है। तीसरा पक्ष उपभोक्ता है, जो चाहता है कि उसे गुणवत्ता से समझौता किए बिना उचित कीमत पर दूध उपलब्ध हो।
इन तीनों के बीच संतुलन बिगड़ने का असर पूरे डेयरी क्षेत्र पर पड़ सकता है। यदि कंपनियां किसानों को उचित मूल्य नहीं दे पातीं तो दूध की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। यदि कंपनियां अपनी लागत नहीं निकाल पातीं तो कारोबार की स्थिरता प्रभावित होगी। वहीं खुदरा कीमतों में लगातार वृद्धि उपभोक्ताओं के घरेलू बजट पर दबाव डालेगी।
घी और मक्खन की कीमतों में वृद्धि के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अगला मूल्य संशोधन पॉलीपैक दूध में देखने को मिलेगा? फिलहाल अमूल की ओर से दूध की कीमतों में किसी नई बढ़ोतरी की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। इसलिए तत्काल दूध महंगा होने का दावा करना उचित नहीं होगा।
लेकिन इतना स्पष्ट है कि दूध उत्पादन की लागत, पशु आहार की कीमतें, दूध की उपलब्धता और खरीद मूल्य आने वाले समय में डेयरी बाजार की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक होंगे। डेयरी उद्योग के सामने अब सबसे बड़ा सवाल केवल दूध का दाम बढ़ाने का नहीं, बल्कि दूध उत्पादन से लेकर उपभोक्ता तक पहुंचने वाली पूरी व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने का है। अमूल की घी-मक्खन की मूल्य वृद्धि ने इस बहस को फिर से सामने ला दिया है। अब देखना होगा कि बढ़ती लागत का अगला असर किसानों को मिलने वाले दूध के खरीद मूल्य पर पड़ता है या उपभोक्ताओं की जेब पर।



