संपादकीय

शरद कटियार

आज की दुनिया में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब किसी देश को कमजोर करने के लिए केवल सीमाओं पर सैनिकों की तैनाती या हथियारों का इस्तेमाल ही पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था, वित्तीय संस्थानों और डिजिटल बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना भी एक बड़ी रणनीति बन चुका है। साइबर हमलों के बढ़ते खतरे ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है। ऐसे समय में भारत की बैंकिंग व्यवस्था को सुरक्षित रखना केवल वित्तीय संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मजबूती से जुड़ा विषय है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के 169 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित डेटा सेंटर और साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण संस्थान का उद्घाटन करते हुए इसी चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में दुश्मन देशों की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के लिए भी प्रयास कर सकते हैं। इसलिए भारत की तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था और बैंकिंग नेटवर्क को साइबर अपराधियों तथा साइबर आतंकवादियों से बचाना अनिवार्य है।

प्रधानमंत्री का यह संदेश ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब देश में डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन बैंकिंग और इलेक्ट्रॉनिक वित्तीय सेवाओं का दायरा लगातार बढ़ रहा है। आम आदमी से लेकर बड़े कारोबारी तक, आज वित्तीय लेनदेन के लिए डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हैं। ऐसे में किसी बड़े साइबर हमले का असर केवल बैंकों के कंप्यूटर सिस्टम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव आम नागरिकों के धन, कारोबार और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।

साइबर सुरक्षा के बिना डिजिटल विकास अधूरा

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया है। ऑनलाइन भुगतान, मोबाइल बैंकिंग और सीधे बैंक खातों में सरकारी सहायता पहुंचाने जैसी व्यवस्थाओं ने वित्तीय लेनदेन को पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक बनाया है। लेकिन तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ जोखिम भी बढ़े हैं। धोखाधड़ी, डेटा चोरी, फर्जी डिजिटल लेनदेन और बैंकिंग प्रणालियों पर संभावित साइबर हमले ऐसी चुनौतियां हैं, जिनसे निपटने के लिए निरंतर तैयारी आवश्यक है।

साइबर अपराधियों के तरीके लगातार बदल रहे हैं। इसलिए केवल पुराने सुरक्षा उपकरणों और परंपरागत प्रशिक्षण के सहारे इन खतरों का मुकाबला नहीं किया जा सकता। आधुनिक तकनीकी ढांचे, विशेषज्ञ कर्मचारियों, नियमित प्रशिक्षण और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली की जरूरत है। आरबीआई का नया डेटा सेंटर और साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण संस्थान इसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, इन संस्थानों की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे बदलते खतरों के अनुरूप कितनी प्रभावी सुरक्षा व्यवस्था विकसित कर पाते हैं।

बैंकिंग क्षेत्र की सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू आम ग्राहकों को जागरूक बनाना भी है। डिजिटल धोखाधड़ी के कई मामलों में अपराधी लोगों की जानकारी, लापरवाही या विश्वास का फायदा उठाते हैं। इसलिए बैंकों को तकनीकी सुरक्षा मजबूत करने के साथ ग्राहकों को भी सतर्क रहने के लिए लगातार जागरूक करना चाहिए।

वित्तीय समावेशन से आर्थिक मजबूती तक

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में बैंकिंग सेवाओं के विस्तार और वित्तीय समावेशन का भी उल्लेख किया। उन्होंने पूर्ववर्ती सरकारों की बैंकिंग नीतियों की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि गरीबों, किसानों, महिलाओं और मध्यम वर्ग के लोगों को कर्ज प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था, जबकि प्रभावशाली लोगों को बड़े ऋण आसानी से उपलब्ध हो जाते थे। उन्होंने बैंकिंग क्षेत्र में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों यानी एनपीए की समस्या का जिक्र करते हुए वर्ष 2014 के बाद किए गए सुधारों को भी रेखांकित किया।

इन राजनीतिक आरोपों और दावों का मूल्यांकन तथ्यों तथा आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए। फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और ऋण वितरण की निष्पक्षता किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी हैं। बैंकों का उद्देश्य केवल बड़े कारोबारियों को वित्तीय सहायता देना नहीं, बल्कि छोटे उद्यमियों, किसानों, कारीगरों और जरूरतमंद लोगों तक भी संस्थागत वित्त की पहुंच सुनिश्चित करना है।

प्रधानमंत्री ने जनधन खातों के विस्तार और सरकारी योजनाओं की राशि सीधे लाभार्थियों के खातों में भेजे जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि वित्तीय सेवाओं की पहुंच में व्यापक बदलाव आया है। उन्होंने लगभग 60 करोड़ जनधन खातों का भी जिक्र किया। वित्तीय समावेशन का वास्तविक लाभ तभी सुनिश्चित होगा, जब बैंक खाते खोलने के साथ-साथ लोगों को उनका प्रभावी उपयोग करने, सुरक्षित डिजिटल लेनदेन करने और जरूरत के समय उचित बैंकिंग सहायता प्राप्त करने की सुविधा भी मिले।

पूर्वी भारत के विकास की अहम भूमिका

भुवनेश्वर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने पूर्वी भारत को विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला क्षेत्र बताया। यह विचार इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश का संतुलित विकास तभी संभव है, जब छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों को भी आधुनिक बुनियादी ढांचे, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा वित्तीय सेवाओं के पर्याप्त अवसर मिलें।

ओडिशा जैसे राज्यों में तकनीकी संस्थानों और वित्तीय बुनियादी ढांचे का विस्तार स्थानीय स्तर पर रोजगार और कौशल विकास की संभावनाओं को भी बढ़ा सकता है। लेकिन किसी परियोजना की उपयोगिता केवल उसके उद्घाटन से तय नहीं होती। जरूरी यह है कि उससे आम नागरिकों, स्थानीय अर्थव्यवस्था और देश की संस्थागत क्षमता को कितना ठोस लाभ मिलता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा का नया मोर्चा

आज आर्थिक शक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ चुकी हैं। किसी देश की बैंकिंग व्यवस्था में व्यवधान पैदा करना, वित्तीय डेटा चुराना या डिजिटल भुगतान प्रणाली को प्रभावित करना व्यापक आर्थिक नुकसान का कारण बन सकता है। इसीलिए साइबर सुरक्षा को केवल तकनीकी विभागों तक सीमित रखने के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा की व्यापक रणनीति का हिस्सा बनाना समय की मांग है।

इसके लिए सरकार, आरबीआई, सार्वजनिक और निजी बैंकों, तकनीकी विशेषज्ञों तथा आम नागरिकों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। साइबर हमलों की समय रहते पहचान, संवेदनशील डेटा की सुरक्षा, नियमित सुरक्षा परीक्षण और आपातकालीन परिस्थितियों में सेवाएं बहाल करने की क्षमता पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। साथ ही, साइबर सुरक्षा के नाम पर नागरिकों की निजता और व्यक्तिगत वित्तीय जानकारी की सुरक्षा से भी कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

प्रधानमंत्री के संबोधन से स्पष्ट है कि आने वाले समय में भारत की बैंकिंग व्यवस्था के सामने दोहरी जिम्मेदारी होगी—एक ओर अधिक से अधिक लोगों तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाना और दूसरी ओर उन सेवाओं को सुरक्षित तथा भरोसेमंद बनाए रखना। आर्थिक विकास की गति तभी टिकाऊ होगी, जब नागरिकों को अपनी जमा पूंजी, डिजिटल लेनदेन और बैंकिंग संस्थानों पर भरोसा बना रहे।