लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय के जैवरसायन विभाग में पूर्व छात्र संघ (एएडीबी) की ओर से आयोजित पुरस्कार समारोह में भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों, शोध और नवाचार की उपलब्धियों पर विस्तार से चर्चा हुई। कार्यक्रम में पद्मश्री से सम्मानित वैज्ञानिक डॉ. नवीन खन्ना ने भारत में विकसित स्वदेशी डेंगू जांच किट की सफलता की कहानी साझा करते हुए बताया कि किस तरह देश में अपनी तकनीक विकसित करने का प्रयास आगे बढ़ा और आज भारतीय जांच किट दुनिया के कई देशों तक पहुंच रही हैं। उन्होंने इस उपलब्धि के पीछे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और डॉ. रामनाथ कोविंद के प्रोत्साहन तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन का भी उल्लेख किया।

डॉ. नवीन खन्ना ने बताया कि स्वदेशी डेंगू जांच किट विकसित करने का अभियान देश में वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास रहा है। उनका कहना था कि भारत में विकसित जांच तकनीक की सफलता ने देश के वैज्ञानिकों की क्षमता और अनुसंधान के महत्व को सामने रखा है। आज भारतीय जांच किट का दूसरे देशों तक पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि देश में विकसित वैज्ञानिक तकनीक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बना रही है। उन्होंने शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को अनुसंधान के क्षेत्र में नए प्रयोग करने तथा देश की जरूरतों के अनुरूप तकनीक विकसित करने के लिए प्रेरित किया।

समारोह के दौरान जैवरसायन विभाग के तीन सेवानिवृत्त शिक्षकों प्रो. जीजी सानवाल, प्रो. प्रकाश चंद्र मिश्रा और प्रो. मिथिलेश कुमार मिश्रा को उनके लंबे शैक्षणिक योगदान और विभाग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका के लिए 'रेणु और नरेंद्र टुटेजा बायोरत्न लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' से सम्मानित किया गया। इस सम्मान के माध्यम से विभाग ने अपने वरिष्ठ शिक्षकों के वर्षों के समर्पण, शिक्षण और शोध कार्यों को सम्मान दिया।

वहीं, नई दिल्ली स्थित आईसीजीईबी के वैज्ञानिक डॉ. नवीन खन्ना को 'प्रो. जीजी सानवाल ओरेशन अवार्ड' प्रदान किया गया। उनके वैज्ञानिक योगदान और स्वदेशी डेंगू जांच किट के विकास से जुड़ी उपलब्धियों को कार्यक्रम में विशेष रूप से रेखांकित किया गया।

कार्यक्रम में शोध के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले युवा वैज्ञानिकों को भी सम्मानित किया गया। अमेरिका की स्टोनी ब्रुक यूनिवर्सिटी में पोस्टडॉक्टरल फेलो डॉ. सना अख्तर उस्मानी को 'प्रो. एसके अग्रवाल बेस्ट पेपर अवार्ड' दिया गया। उनके शोध में कैंडिडा एल्बिकेंस यीस्ट में आयरन और वसा चयापचय में होने वाले बदलावों तथा एंटीफंगल दवाओं के प्रभाव के बीच संबंधों का अध्ययन किया गया है। यह शोध संक्रमण और उसके उपचार से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जय प्रकाश सैनी ने शोध, नवाचार और पूर्व छात्र नेटवर्क को मजबूत बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की पहचान केवल उसकी शैक्षणिक परंपरा से नहीं, बल्कि वहां से निकलने वाले विद्यार्थियों की उपलब्धियों और समाज के प्रति उनके योगदान से भी बनती है। शोध और नवाचार को प्रोत्साहित करने के लिए शिक्षकों, विद्यार्थियों और पूर्व छात्रों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।

इस अवसर पर एएडीबी के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. अनिल रस्तोगी सहित कई पूर्व छात्रों ने भी अपने अनुभव साझा किए। कार्यक्रम में वैज्ञानिक अनुसंधान, उच्च शिक्षा और विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों की भूमिका पर चर्चा हुई। समारोह के माध्यम से वरिष्ठ शिक्षकों के योगदान को सम्मान देने के साथ-साथ नई पीढ़ी के शोधार्थियों को वैज्ञानिक क्षेत्र में आगे बढ़ने का संदेश दिया गया।