संपादकीय

शरद कटियार

शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को सही जानकारी देना और उनमें इतिहास के प्रति समझ विकसित करना है। ऐसे में स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। पुवायां के मारवाह मॉडर्न स्कूल में कक्षा छह के विद्यार्थियों को पढ़ाई जा रही ‘इंटीग्रेटेड सोशल स्टडीज’ पुस्तक में देश के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के नाम के सामने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह का चित्र प्रकाशित होना चिंताजनक है। पुस्तक के पृष्ठ संख्या 167 पर प्रधानमंत्रियों की चित्रावली में हुई यह गलती सामान्य टंकण त्रुटि नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों की प्रस्तुति से जुड़ी गंभीर चूक है।

वीपी सिंह देश के आठवें प्रधानमंत्री रहे, जबकि जनरल वीके सिंह का भारतीय सेना में अलग और महत्वपूर्ण योगदान रहा है। दोनों की पहचान, कार्यक्षेत्र और सार्वजनिक जीवन की भूमिका बिल्कुल अलग है। इसके बावजूद प्रधानमंत्रियों की सूची में जनरल वीके सिंह का चित्र प्रकाशित होना बताता है कि पुस्तक तैयार करने के दौरान तथ्यों का पर्याप्त मिलान नहीं किया गया। छठी कक्षा के विद्यार्थी इतिहास और नागरिक जीवन की बुनियादी जानकारी इसी उम्र में ग्रहण करते हैं। यदि उन्हें पाठ्यपुस्तकों में गलत तस्वीरें और तथ्य मिलेंगे तो उनकी समझ पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

इस मामले में पुस्तक के लेखक, संपादक और प्रकाशक की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। पुस्तक के लेखक आशीष गर्ग हैं, जबकि संपादन का दायित्व दमयंती गुप्ता और अंचल जैन ने संभाला है। इसका प्रकाशन आगरा की ए यूनिट पब्लिशिंग (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड ने किया है। पांच सौ रुपये मूल्य की पुस्तक से अभिभावक और विद्यालय यह अपेक्षा करते हैं कि उसमें दी गई सामग्री प्रमाणिक, तथ्यपरक और त्रुटिरहित होगी। आखिर पुस्तक की सामग्री को अंतिम रूप देने से पहले कितने स्तरों पर जांच की गई और इतनी स्पष्ट गलती कैसे रह गई?

यह घटना केवल एक विद्यालय या एक प्रकाशक तक सीमित सवाल नहीं छोड़ती, बल्कि पूरी पाठ्यपुस्तक निर्माण प्रक्रिया की गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत बताती है। किताबों में प्रकाशित प्रत्येक नाम, चित्र, तारीख और ऐतिहासिक तथ्य की विशेषज्ञों से जांच होनी चाहिए। गलती सामने आने के बाद उसे स्वीकार कर सुधार करना भी उतना ही आवश्यक है। संबंधित प्रकाशक और संपादकीय टीम को इस त्रुटि पर स्पष्टीकरण देते हुए संशोधित सामग्री उपलब्ध करानी चाहिए। शिक्षा में छोटी दिखने वाली गलतियां भी विद्यार्थियों के ज्ञान की नींव को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए पाठ्यपुस्तकों में शुद्धता को औपचारिकता नहीं, अनिवार्य जिम्मेदारी माना जाना चाहिए।