डॉ. विजय गर्ग

गरीबी किसी भी देश के सामाजिक और आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण मापदंड है। यह केवल लोगों की आय को ही नहीं दर्शाती, बल्कि भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, आवास, रोजगार और अन्य बुनियादी सुविधाओं तक उनकी पहुंच को भी प्रतिबिंबित करती है। गरीबी कम करने के क्षेत्र में भारत की प्रगति ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है। विश्व बैंक की हालिया रिपोर्टें जीवन स्तर में हुए महत्वपूर्ण सुधारों को उजागर करती हैं, लेकिन साथ ही यह भी बताती हैं कि अभी कई चुनौतियां बाकी हैं।

विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की गरीबी एवं समानता संबंधी रिपोर्ट के अनुसार, निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए निर्धारित 4.20 अमेरिकी डॉलर प्रतिदिन प्रति व्यक्ति की गरीबी रेखा के आधार पर भारत में गरीबी की दर 2011-12 में 57.7 प्रतिशत थी, जो 2023-24 में घटकर 16.1 प्रतिशत रह गई। इसका अर्थ है कि लगभग 49.6 करोड़ लोग इस गरीबी रेखा से ऊपर आ गए।

रिपोर्ट में अत्यधिक गरीबी में आई उल्लेखनीय कमी का भी उल्लेख किया गया है। प्रतिदिन 3 अमेरिकी डॉलर से कम आय पर जीवनयापन करने वाले लोगों का अनुपात 2011-12 में 27.1 प्रतिशत था, जो 2023-24 में घटकर 2.6 प्रतिशत रह गया। ये आंकड़े परिवारों की खपत और जीवन स्थितियों में आए महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाते हैं।

विश्व बैंक ने यह भी अनुमान लगाया है कि 4.20 डॉलर वाली गरीबी रेखा के आधार पर भारत में गरीबी की दर 2026 में अनुमानित 14.2 प्रतिशत से घटकर 2028 तक 12.1 प्रतिशत हो सकती है। यह दो वर्षों का अनुमान है, न कि बारह वर्षों का। इसकी प्राप्ति आर्थिक परिस्थितियों और रोजगार बाजार में होने वाले बदलावों पर भी निर्भर करेगी।

गरीबी में कमी के पीछे क्या कारण हैं?

इस प्रगति के पीछे कई महत्वपूर्ण कारक हैं। आर्थिक विकास, परिवारों की बढ़ती खपत, रोजगार के अवसर और सरकारी कल्याणकारी योजनाओं ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

खाद्य सुरक्षा योजनाओं और रियायती दरों पर अनाज वितरण ने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को अपनी बुनियादी पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता दी है। सामाजिक सहायता योजनाओं और आवश्यक सेवाओं तक बेहतर पहुंच ने भी परिवारों के जीवन स्तर को सुधारने में योगदान दिया है।

एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव रोजगार में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है। 2017 से 2023 के बीच भारत में रोजगार प्राप्त लोगों की संख्या में लगभग 13.4 करोड़ की वृद्धि हुई। ग्रामीण महिलाओं का वेतनभोगी कार्यों में शामिल होना इस वृद्धि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। जब परिवार के अधिक सदस्य कमाने लगते हैं, तो घरेलू आय बढ़ती है और आर्थिक आत्मनिर्भरता को बल मिलता है।

ग्रामीण और शहरी गरीबी में अंतर

समग्र प्रगति के बावजूद भारत में गरीबी की स्थिति सभी क्षेत्रों में समान नहीं है। 4.20 डॉलर की गरीबी रेखा के आधार पर 2023 में ग्रामीण गरीबी की दर लगभग 19.3 प्रतिशत थी, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 8.6 प्रतिशत थी।

ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं, स्थायी रोजगार और बुनियादी ढांचे की कमी जैसी समस्याएं अभी भी मौजूद हैं। क्षेत्रीय असमानता भी एक बड़ी चुनौती है। उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक के कई राज्यों में गरीब आबादी का बड़ा हिस्सा रहता है।

इन असमानताओं को कम करने के लिए क्षेत्र-विशेष विकास योजनाओं, बेहतर बुनियादी ढांचे, कृषि के आधुनिकीकरण, ग्रामीण उद्योगों और शिक्षा के अधिक अवसरों की आवश्यकता है।

रोजगार और आय की चुनौती

विश्व बैंक के निष्कर्षों से एक महत्वपूर्ण सबक मिलता है कि केवल रोजगार में वृद्धि आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं देती। रोजगार के अवसर बढ़ने के बावजूद वास्तविक आय में वृद्धि काफी सीमित रही है। नए रोजगारों में से कई कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में पैदा हुए हैं।

युवाओं में बेरोजगारी भी चिंता का विषय है। 2025-26 और 2026-27 की पहली तिमाहियों के बीच युवा बेरोजगारी की दर 14.6 प्रतिशत से बढ़कर 15.9 प्रतिशत होने की रिपोर्ट इस बात की आवश्यकता बताती है कि युवाओं और ग्रामीण महिलाओं के लिए अधिक प्रभावी रोजगार नीतियां बनाई जाएं।

भारत को उत्पादक, सुरक्षित और उचित वेतन वाले रोजगार पैदा करने पर ध्यान देना चाहिए। कौशल विकास, व्यावसायिक शिक्षा, स्वरोजगार, औद्योगिक विकास, आधुनिक कृषि और डिजिटल उद्योग युवाओं के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं।

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं: प्रगति की नींव

गरीबी का स्थायी उन्मूलन केवल आर्थिक सहायता पर निर्भर नहीं हो सकता। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को अच्छे स्कूलों, डिजिटल शिक्षा, छात्रवृत्तियों और व्यावसायिक प्रशिक्षण के माध्यम से अपनी प्रतिभा विकसित करने के अवसर मिलने चाहिए।

इसी प्रकार, स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच परिवारों को महंगे इलाज के कारण गरीबी में जाने से बचा सकती है। बेहतर पोषण, स्वच्छता, साफ पेयजल और बीमारियों से बचाव के लिए स्वास्थ्य सेवाएं मानव विकास के महत्वपूर्ण आधार हैं।

आंकड़ों से परे: आगे का रास्ता

गरीबी के आंकड़े महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं, लेकिन वे मानवीय कठिनाइयों के हर पहलू को व्यक्त नहीं कर सकते। कोई परिवार अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा से ऊपर आने के बावजूद खराब आवास, कुपोषण, अस्थिर रोजगार या बढ़ती महंगाई से जूझ सकता है।

विश्व बैंक ने यह भी स्पष्ट किया है कि गरीबी के अनुमानों में बदलाव बेहतर मापन प्रणाली और जीवन स्तर में वास्तविक सुधार, दोनों कारणों से हो सकता है। इसलिए गरीबी के आंकड़ों को समझदारी और सावधानी से देखने की आवश्यकता है।

भारत के सामने अगली बड़ी चुनौती गरीबी में कमी को स्थायी समृद्धि में बदलना है। आर्थिक विकास का लाभ समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक बेहतर अवसरों, उचित मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी सेवाओं तक समान पहुंच के माध्यम से पहुंचना चाहिए।

अंततः किसी विकासशील देश की सफलता केवल उसकी आर्थिक वृद्धि या गरीबी रेखा से ऊपर आने वाले लोगों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। इसका वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि क्या प्रत्येक नागरिक सम्मान के साथ जीवन जी सकता है, अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल कर सकता है और सार्थक रोजगार पा सकता है।

विश्व बैंक के निष्कर्ष भारत की प्रगति की एक उत्साहजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। लेकिन एक समावेशी और समृद्ध समाज के निर्माण के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। आंकड़ों से परे वास्तविक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विकास का लाभ आम लोगों के दैनिक जीवन में स्पष्ट रूप से दिखाई दे।

डॉ. विजय गर्ग

सेवानिवृत्त प्रिंसिपल | शिक्षाविद् | प्रसिद्ध गणितज्ञ

अकादमिक संपादक, ऑनलाइन पत्रिका FNBWorld.com

स्ट्रीट कौर चंद, एम.एच.आर., मलोट, पंजाब – 152107

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