लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आयुर्वेद चिकित्सा व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है। दूसरे राज्यों और प्रदेश के अलग-अलग जिलों के आयुर्वेद मेडिकल कॉलेजों में फर्जी तरीके से शिक्षक के रूप में दर्ज रहने वाले 34 डॉक्टरों पर बड़ी कार्रवाई की गई है। भारतीय चिकित्सा प्रणाली के राष्ट्रीय आयोग (एनसीआईएसएम) की जांच रिपोर्ट के आधार पर उत्तर प्रदेश आयुर्वेदिक यूनानी तिब्बी बोर्ड ने इन सभी डॉक्टरों को एक वर्ष के लिए डिबार कर दिया है। इस कार्रवाई के बाद संबंधित डॉक्टर नवंबर 2027 तक न तो किसी मेडिकल कॉलेज में अध्यापन कर सकेंगे और न ही मरीजों का उपचार कर पाएंगे।

जानकारी के मुताबिक, प्रदेश में पंजीकृत कई आयुर्वेद डॉक्टर उत्तर प्रदेश में मरीजों का इलाज कर रहे थे, जबकि उनके नाम दूसरे राज्यों के आयुर्वेद मेडिकल कॉलेजों में शिक्षक के रूप में दर्ज थे। हैरानी की बात यह रही कि इनमें से कई डॉक्टर संबंधित मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाने के लिए मौजूद ही नहीं थे। कुछ डॉक्टर प्रदेश में एक स्थान पर क्लीनिक संचालित कर मरीजों का उपचार कर रहे थे, जबकि उनकी नियुक्ति दूसरे जिले के मेडिकल कॉलेज में शिक्षक के तौर पर दर्शाई गई थी।

इस गड़बड़ी का खुलासा भारतीय चिकित्सा प्रणाली के राष्ट्रीय आयोग (एनसीआईएसएम) की ओर से देशभर के आयुर्वेद मेडिकल कॉलेजों में कराई गई जांच के दौरान हुआ। जांच में करीब 400 ऐसे शिक्षक चिह्नित किए गए, जिनके नाम कॉलेजों के रिकॉर्ड में कार्यरत शिक्षकों के रूप में दर्ज थे, लेकिन निरीक्षण के दौरान वे संबंधित संस्थानों में मौजूद नहीं मिले। इनमें उत्तर प्रदेश के 34 डॉक्टर भी शामिल पाए गए।

जांच में सामने आया कि उत्तर प्रदेश के इन 34 डॉक्टरों का पंजीयन प्रदेश के आयुर्वेदिक यूनानी तिब्बी बोर्ड में था। इसके बावजूद उनके नाम अलग-अलग मेडिकल कॉलेजों में शिक्षक के रूप में दर्ज थे। इनमें तीन डॉक्टर हरियाणा के मेडिकल कॉलेजों में, जबकि एक-एक डॉक्टर राजस्थान, बिहार और हिमाचल प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत दर्शाए गए थे। वहीं शेष 28 डॉक्टरों के नाम उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों के आयुर्वेद मेडिकल कॉलेजों में शिक्षक के तौर पर दर्ज मिले।

एनसीआईएसएम की जांच रिपोर्ट मिलने के बाद उत्तर प्रदेश आयुर्वेदिक यूनानी तिब्बी बोर्ड ने सभी 34 डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उनका पंजीयन एक साल के लिए डिबार कर दिया है। बोर्ड की ओर से संबंधित डॉक्टरों के गृह क्षेत्रों में तैनात क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारियों को भी पत्र भेजा गया है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि यदि संबंधित डॉक्टर अपने क्षेत्र में क्लीनिक संचालित कर रहे हैं तो उनके मरीजों का उपचार करने पर रोक लगाने की कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

नियमों के मुताबिक, किसी भी राज्य में मरीजों का उपचार करने के लिए वहां के संबंधित चिकित्सा बोर्ड में पंजीयन कराना अनिवार्य होता है। यदि उत्तर प्रदेश में पंजीकृत कोई डॉक्टर दूसरे राज्य के मेडिकल कॉलेज या अस्पताल में नौकरी करता है तो उसे संबंधित राज्य में भी निर्धारित नियमों के तहत पंजीयन कराना पड़ता है। इसके लिए मूल राज्य का पंजीयन स्थानांतरित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

जांच के दौरान ऐसे छह डॉक्टर भी सामने आए, जिनके नाम दूसरे राज्यों के मेडिकल कॉलेजों में शिक्षक के रूप में दर्ज थे, जबकि उनका पंजीयन उत्तर प्रदेश में ही बना हुआ था।