- मथुरा की किसमुद्दीन फर्म को मिला 15 दिन का ठेका
- प्रत्येक बंदर के हिसाब से होगा भुगतान
- पकड़े गए बंदरों को कहां छोड़ा जाएगा, इस पर ठेकेदार मौन
फर्रुखाबाद। शहर में बंदरों के बढ़ते आतंक से लोगों को राहत दिलाने के लिए नगर पालिका ने आखिरकार अभियान शुरू कराने की तैयारी की है। इसके लिए मथुरा की किसमुद्दीन फर्म को 15 दिन का ठेका दिया गया है। ठेकेदार के मुताबिक पकड़े जाने वाले प्रत्येक बंदर के हिसाब से नगर पालिका फर्म को भुगतान करेगी। अभियान के दौरान टीम के साथ नगर पालिका की गाड़ी भी रहेगी और प्रतिदिन अधिक से अधिक बंदरों को पकड़ने का लक्ष्य रखा गया है।
प्रारंभिक तौर पर रेलवे स्टेशन, बस अड्डा, सरकारी अस्पताल और कोतवाली जैसे सरकारी परिसरों को अभियान के दायरे में रखा गया है। लेकिन नगर पालिका की इस पहल के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बंदरों का आतंक केवल सरकारी परिसरों तक ही सीमित है? शहर के दर्जनों मोहल्लों में रहने वाले लोग लंबे समय से बंदरों के उत्पात से परेशान हैं। ऐसे में यदि अभियान सरकारी परिसरों तक सीमित रह गया तो आम नागरिकों को राहत कैसे मिलेगी?
अभियान को लेकर सबसे गंभीर सवाल पकड़े गए बंदरों को सुरक्षित स्थान पर छोड़ने का है। ठेकेदार से जब इस संबंध में जानकारी मांगी गई तो वह भी स्पष्ट जवाब नहीं दे सके। उनका कहना है कि बंदरों को कहां छोड़ा जाएगा, यह नगर पालिका प्रशासन तय करेगा। ऐसे में वन विभाग की अनुमति, सुरक्षित स्थान की उपलब्धता और बंदरों को छोड़ने के बाद उनकी निगरानी जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
वन्यजीवों से जुड़े नियमों और सुरक्षा व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करना भी जरूरी है। नगर पालिका को स्पष्ट करना चाहिए कि बंदरों को पकड़ने और स्थानांतरित करने की प्रक्रिया किस योजना के तहत होगी तथा इसमें संबंधित विभागों की क्या भूमिका रहेगी।
शहर की जमीनी हकीकत यह है कि बंदरों का आतंक केवल रेलवे स्टेशन, अस्पताल या सरकारी कार्यालयों तक सीमित नहीं है। दर्जनों मोहल्लों में बंदरों के झुंड छतों, गलियों और घरों में घुसकर उत्पात मचाते हैं। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को घर से बाहर निकलने तक में सावधानी बरतनी पड़ती है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक बंदरों के हमलों और पीछा करने के दौरान कई लोग छतों से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं। कुछ घटनाओं में जान जाने की भी बात सामने आई है। बंदरों के काटने और हमलों में घायल लोग डॉ. राममनोहर लोहिया अस्पताल सहित विभिन्न सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में उपचार और एंटी रेबीज इंजेक्शन लगवाने पहुंचते हैं।
बंदरों का उत्पात केवल लोगों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। घरों की छतों और बालकनियों में शौक से लगाए गए गमलों के पौधे भी इनके हमलों से कुछ ही दिनों में उजड़ जाते हैं। खाने-पीने का सामान उठाने से लेकर घरों में तोड़फोड़ तक की घटनाएं लोगों की रोजमर्रा की परेशानी बन चुकी हैं।
नगर पालिका के 15 दिवसीय अभियान से लोगों को उम्मीद जरूर जगी है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि अभियान कितने व्यापक स्तर पर चलाया जाता है। केवल सरकारी परिसरों से बंदरों को पकड़कर मोहल्लों की समस्या को नजरअंदाज करना लोगों की परेशानी का स्थायी समाधान नहीं होगा।




