- कहीं अग्निशमन उपकरण गायब, कहीं बंद पड़ी पाइपलाइन तो कहीं हाई पावर मोटर की जगह घरेलू टिल्लू पंप!
- मसेनी से पांचाल घाट तक निजी अस्पतालों की अग्नि सुरक्षा पर जिम्मेदार मौन
फर्रुखाबाद।**
लखनऊ के भीषण अग्निकांडों से भी जिम्मेदारों ने सबक नहीं लिया। हादसों के बाद शासन ने अस्पतालों, नर्सिंग होम और व्यावसायिक भवनों में अग्निशमन व्यवस्था दुरुस्त करने के निर्देश दिए, लेकिन फर्रुखाबाद में इन निर्देशों की जमीनी हकीकत चौंकाने वाली बताई जा रही है। यहां कई भवनों में आग बुझाने के इंतजाम कागजों और दीवारों तक सिमटे होने के आरोप हैं। कहीं अग्निशमन उपकरणों का पता नहीं, कहीं सिस्टम बंद पड़ा है और कहीं निर्धारित क्षमता की मोटर के स्थान पर घरेलू उपयोग वाला टिल्लू पंप लगाए जाने की शिकायत सामने आई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यवस्था को आग लगने पर जिंदगी बचानी चाहिए, वही व्यवस्था यदि आपातकाल में जवाब दे गई तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
अग्निशमन सुरक्षा व्यवस्था में भवन की ऊंचाई, क्षेत्रफल, उपयोग और स्वीकृत अग्नि सुरक्षा योजना के अनुसार निर्धारित क्षमता के पंप, मोटर और पानी की आपूर्ति व्यवस्था जरूरी होती है। लेकिन आरोप है कि कुछ प्रतिष्ठानों में मानकों के अनुरूप अग्निशमन पंप लगाने के बजाय घरेलू पानी की आपूर्ति में इस्तेमाल होने वाले टिल्लू पंप लगा दिए गए हैं।
मसेनी चौराहे से पांचाल घाट की ओर स्थित एक नर्सिंग होम में इस तरह की व्यवस्था होने की शिकायत सामने आई है। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो यह महज तकनीकी कमी नहीं, बल्कि मरीजों और कर्मचारियों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला होगा।
सवाल यह भी है कि फायर विभाग ने जब भवनों का निरीक्षण किया तो क्या पंप की वास्तविक क्षमता जांची गई? क्या मोटर को चलाकर पानी का दबाव परखा गया? या फिर उपकरणों की मौजूदगी देखकर ही औपचारिकता पूरी कर दी गई?
मसेनी चौराहे और आसपास के क्षेत्र में बड़ी संख्या में निजी अस्पताल और चिकित्सा प्रतिष्ठान संचालित हैं। बताया जा रहा है कि यहां एक सैकड़ा से अधिक अस्पताल और चिकित्सा संस्थान हैं। ऐसे में अग्निशमन सुरक्षा की नियमित जांच बेहद जरूरी है।
अस्पताल कोई सामान्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं होता। यहां ऐसे मरीज भर्ती रहते हैं जो स्वयं चलकर बाहर नहीं निकल सकते। आईसीयू, ऑपरेशन थिएटर और अन्य चिकित्सा इकाइयों में भर्ती मरीजों को सुरक्षित निकालना बड़ी चुनौती होती है।
ऐसे में यदि आग लगने पर पानी का दबाव ही नहीं बने, अलार्म काम न करे या अग्निशमन उपकरण इस्तेमाल के लायक न हों तो कुछ ही मिनटों में बड़ा हादसा हो सकता है। सवाल है कि क्या मरीजों की जिंदगी को केवल दीवार पर टंगे अग्निशमन यंत्रों के भरोसे छोड़ा जा सकता है?
आरोप हैं कि अग्निशमन विभाग के अभियान और नोटिस जारी होने की कार्रवाई के बाद कुछ भवन संचालकों ने आनन-फानन में उपकरण लगवाकर औपचारिकता पूरी कर ली। लेकिन उपकरणों की क्षमता, संचालन और नियमित रखरखाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
यदि ऐसा है तो यह जांच का विषय है कि भवनों को अग्नि सुरक्षा संबंधी अनापत्ति प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी किए गए और उनके बाद कितनी बार निरीक्षण हुआ। क्या प्रमाणपत्र जारी करने के बाद व्यवस्था की दोबारा जांच की जाती है? क्या मौके पर लगे पंप और स्वीकृत अग्नि सुरक्षा योजना का मिलान किया जाता है?
शहर के अस्पतालों और व्यावसायिक भवनों में कथित कमियों के सामने आने के बाद अग्निशमन विभाग की निरीक्षण व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। यदि किसी भवन में मानक से कम क्षमता का पंप लगा है तो उसे प्रमाणन के समय कैसे स्वीकार किया गया? यदि उपकरण खराब हैं तो नियमित जांच में इसका खुलासा क्यों नहीं हुआ?
मामले में केवल भवन संचालकों को नोटिस देना पर्याप्त नहीं होगा। जिन प्रतिष्ठानों में शिकायतें हैं, वहां तकनीकी टीम भेजकर वास्तविक स्थिति का परीक्षण कराना जरूरी है।
इस संबंध में अग्निशमन अधिकारी द्वितीय प्रांशु अवस्थी ने बताया कि अग्नि सुरक्षा को लेकर लगातार अभियान चलाया जा रहा है। अभियान आगे भी जारी रहेगा। जिन भवन संचालकों ने निर्धारित अग्निशमन सुरक्षा मानक पूरे नहीं किए हैं, उन्हें नोटिस जारी किए जाएंगे। संबंधित लोगों को व्यवस्था दुरुस्त करने के निर्देश दिए जा रहे हैं। निर्देशों का पालन नहीं करने वालों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
- क्या मसेनी चौराहे से पांचाल घाट तक सभी अस्पतालों का अग्नि सुरक्षा ऑडिट कराया जाएगा?
- क्या कथित टिल्लू पंप की तकनीकी जांच कराई जाएगी?
- क्या अग्निशमन पंप की क्षमता और पानी के दबाव का वास्तविक परीक्षण होगा?
- क्या बंद पड़े अग्निशमन उपकरणों और पाइपलाइनों की सूची सार्वजनिक की जाएगी?
- क्या अग्नि सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी करने और नवीनीकरण की प्रक्रिया की भी समीक्षा होगी?
फर्रुखाबाद में अग्निशमन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रही शिकायतें केवल विभागीय फाइलों का विषय नहीं हैं। यह उन मरीजों, तीमारदारों, चिकित्सकों, कर्मचारियों और आम नागरिकों की जिंदगी का सवाल है, जो प्रतिदिन इन भवनों में पहुंचते हैं।
अगर किसी अस्पताल में आग लगती है तो वहां भर्ती मरीजों को बाहर निकालने के लिए कुछ मिनट भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में दिखावे के उपकरण और कमजोर पंप किसी काम के नहीं होंगे।
अब जरूरत नोटिसों की संख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि प्रत्येक अस्पताल और व्यावसायिक भवन का निष्पक्ष स्थलीय निरीक्षण कराने की है। दोष मिलने पर भवन संचालकों के साथ-साथ प्रमाणन और निरीक्षण प्रक्रिया की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।





