शरद कटियार

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की व्यवस्था का नाम नहीं है, बल्कि यह उन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी टिका होता है, जिनके कंधों पर निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी है। जब इन्हीं संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक दल सवाल उठाने लगें, तो मामला महज सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की साख से जुड़ जाता है।

दिल्ली के रामलीला मैदान में इंडिया ब्लॉक के सांसदों और नेताओं का प्रस्तावित जमावड़ा इसी राजनीतिक टकराव की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर विपक्ष का एकजुट होना बताता है कि चुनाव आयोग की भूमिका अब राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ चुकी है। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी सांसदों का मार्च और रैली के माध्यम से विरोध दर्ज कराने की रणनीति इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति में और मुखर बनाने का प्रयास है।

कांग्रेस सहित तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। विपक्ष चाहता है कि इन सवालों पर सार्वजनिक और संस्थागत स्तर पर जवाब मिले। हालांकि, किसी भी संवैधानिक पदाधिकारी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों का मूल्यांकन राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि तथ्यों, प्रमाणों और स्थापित संवैधानिक प्रक्रियाओं के आधार पर होना चाहिए।

इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या संवैधानिक संस्थाओं पर उठने वाले सवालों का समाधान केवल राजनीतिक प्रदर्शनों से संभव है? निश्चित रूप से विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन उसके साथ ठोस तथ्य, पारदर्शी जांच और जवाबदेही की मांग भी उतनी ही आवश्यक है।

विपक्ष के लिए यह प्रदर्शन अपनी राजनीतिक एकजुटता दिखाने का अवसर हो सकता है, लेकिन उसकी असली परीक्षा इस बात में होगी कि वह अपने आरोपों को कितनी मजबूती से प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह अपनी निष्पक्षता को केवल अपने दावों से नहीं, बल्कि पारदर्शी निर्णयों और सार्वजनिक जवाबदेही से प्रमाणित करे।

लोकतंत्र में चुनाव आयोग की विश्वसनीयता सत्ता पक्ष की सुविधा या विपक्ष की असहमति से तय नहीं होनी चाहिए। यह जनता के विश्वास से तय होती है। रामलीला मैदान में उठने वाली आवाजें राजनीतिक शोर बनकर रह जाती हैं या चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता की नई बहस को जन्म देती हैं, इसका उत्तर आने वाला समय देगा। लोकतंत्र में न संस्थाओं को सवालों से परे रखा जा सकता है और न राजनीतिक आरोपों को अंतिम सत्य माना जा सकता है। निष्पक्ष चुनाव, स्वतंत्र संस्थाएं और जवाबदेह व्यवस्था ही लोकतंत्र की वास्तविक ताकत हैं। देश को टकराव नहीं, तथ्यों पर आधारित जवाब और संस्थाओं के प्रति जनता का अटूट विश्वास चाहिए।