- भगवान पर छोड़ दीजिए अपने जीवन का योगक्षेम
- श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश—न पाने की चिंता, न खोने का भय
- बस इतना विश्वास रखिए कि मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे हैं।
शरद कटियार
मनुष्य का जीवन इच्छाओं, अपेक्षाओं और चिंताओं के बीच गुजरता है। कभी कुछ पाने की लालसा रहती है तो कभी जो मिला है, उसे खो देने का भय सताता है। मनुष्य अपनी इच्छाओं के अनुसार परिस्थितियों को बदलना चाहता है, लेकिन जब परिस्थितियां उसके अनुकूल नहीं होतीं तो वह दुखी और निराश हो जाता है। ऐसे में श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य को एक ऐसा मार्ग दिखाती है, जहां इच्छाओं से ऊपर उठकर भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव विकसित होता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के नौवें अध्याय में भक्त के प्रति अपनी विशेष कृपा का वर्णन करते हुए कहा है,अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।
अर्थात् जो भक्त अनन्य भाव से मेरा चिंतन और उपासना करते हैं तथा निरंतर मुझमें लगे रहते हैं, उनके अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा का भार मैं स्वयं उठाता हूं।
यह श्लोक केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक गहरी कला भी सिखाता है। भगवान का संदेश है कि जो व्यक्ति अपने जीवन को उनके चरणों में समर्पित कर देता है, उसे हर समय भविष्य की चिंता और परिस्थितियों के परिणाम को लेकर परेशान रहने की आवश्यकता नहीं है।
भक्ति का वास्तविक अर्थ केवल भगवान से अपनी इच्छाएं पूरी करवाना नहीं है। सच्ची भक्ति वह है, जिसमें मनुष्य सुख और दुख, लाभ और हानि, सफलता और असफलता में भी भगवान के विधान पर विश्वास बनाए रखता है।
जब मनचाहा हो जाता है तो भगवान का धन्यवाद करना और जब मनचाहा नहीं होता तो निराश हो जाना पूर्ण समर्पण नहीं है। जो व्यक्ति केवल अपनी इच्छा पूरी होने पर प्रसन्न होता है, वह वास्तव में अपने मन की इच्छाओं का दास है।
भक्त का विश्वास इससे आगे होता है। वह जानता है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, भगवान का आश्रय ही उसके जीवन का सबसे बड़ा सहारा है।
श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म, गुण और द्वंद्वों से ऊपर उठने की शिक्षा देते हैं।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥
अर्थात् हे अर्जुन! तीनों गुणों से ऊपर उठो, सुख-दुख और लाभ-हानि जैसे द्वंद्वों से मुक्त रहो, योगक्षेम की चिंता छोड़कर आत्मस्वरूप में स्थित हो जाओ।
इस उपदेश का भाव यह है कि मनुष्य को अपने जीवन में कर्तव्य और कर्म से पीछे नहीं हटना चाहिए, लेकिन हर परिणाम को अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित करने की जिद भी नहीं रखनी चाहिए।
कर्म करना मनुष्य का दायित्व है, लेकिन परिणाम के प्रति अत्यधिक मोह और चिंता उसे मानसिक रूप से अशांत कर देती है।
भक्ति का सर्वोच्च भाव तब प्रकट होता है, जब भक्त भगवान के पास किसी सांसारिक सुख, धन, प्रतिष्ठा, सफलता या यहां तक कि केवल अपने मनचाहे दर्शन की मांग लेकर भी नहीं जाता।
वह केवल इतना स्वीकार कर लेता है,मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे हैं।यही भाव धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर से अहंकार, भय, असुरक्षा और अनावश्यक अपेक्षाओं को कम करता है। जब मनुष्य अपने अस्तित्व को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है, तब भक्ति उसके लिए कोई औपचारिक क्रिया नहीं रह जाती, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाती है।
इसका अर्थ संसार और जिम्मेदारियों से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए भी मन को भगवान से जोड़कर रखना है।
आज के तनावपूर्ण जीवन में हर व्यक्ति किसी न किसी चिंता से घिरा हुआ है। किसी को भविष्य की चिंता है, किसी को परिवार की, किसी को धन की तो किसी को सम्मान और प्रतिष्ठा की।
ऐसे समय में गीता का यह संदेश मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है कि अपनी ओर से उचित कर्म करते रहो, लेकिन हर समय परिणाम की चिंता में मत डूबे रहो।
भगवान पर विश्वास रखो। जो मिला है उसके प्रति कृतज्ञ रहो और जो नहीं मिला, उसके लिए स्वयं को निरंतर दुखी मत करो।
अंततः भक्ति का सार किसी विशेष उपलब्धि को प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपने मन को भगवान के प्रति समर्पित कर देना है।
जब मन में यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे हैं, तब जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी व्यक्ति अपने भीतर शांति और विश्वास का अनुभव कर सकता है।न संसार से कोई शिकायत, न भगवान से कोई मांग। बस उनके चरणों में अटूट विश्वास और निरंतर भजन।




