जालौन के कुठौंद क्षेत्र के डगरू पुरवा गांव से सामने आई सात वर्षीय रितिक की मौत की घटना केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि आज के बदलते बचपन और पारिवारिक व्यवहार पर गंभीर चिंतन करने का अवसर है। मोबाइल पर रील देखने को लेकर बहन द्वारा फोन ले लिए जाने के बाद मासूम की मौत की खबर ने हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर दिया है।

सात वर्ष की उम्र वह होती है, जब बच्चा दुनिया को समझना सीख रहा होता है। उसकी इच्छाएं छोटी होती हैं, लेकिन भावनाएं उसके लिए बहुत बड़ी होती हैं। वह नाराज होता है, जिद करता है, रोता है और कई बार अपनी बात मनवाने के लिए ऐसे व्यवहार करता है, जिनके परिणामों का उसे अंदाजा नहीं होता। इस उम्र में बच्चों को डांट से ज्यादा संवाद, रोक-टोक से ज्यादा समझ और अनुशासन के साथ भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है।

आज मोबाइल फोन बच्चों के जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है। रील, वीडियो और खेल उनकी दिनचर्या में जगह बना चुके हैं। समस्या केवल मोबाइल के इस्तेमाल की नहीं है, बल्कि इस बात की भी है कि कहीं बच्चे धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया के संवाद, खेल और पारिवारिक जुड़ाव से दूर तो नहीं होते जा रहे हैं।

यहां यह समझना भी जरूरी है कि किसी एक घटना के आधार पर मोबाइल को ही मौत का कारण घोषित नहीं किया जा सकता। बच्चे के व्यवहार, परिस्थितियों और घटना के सभी पहलुओं को समझना जरूरी है। लेकिन यह घटना अभिभावकों के लिए एक चेतावनी अवश्य है कि बच्चों की छोटी-छोटी नाराजगी और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को नजरअंदाज न करें।

माता-पिता को चाहिए कि बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार रखें। मोबाइल छीनने या किसी इच्छा को पूरा न करने की स्थिति में उन्हें प्यार से समझाएं। बच्चों को अपनी भावनाएं व्यक्त करना सिखाएं और यह भरोसा दिलाएं कि नाराजगी, असफलता या किसी चीज के न मिलने से जीवन समाप्त नहीं हो जाता।

विद्यालयों में भी बच्चों की भावनात्मक शिक्षा, व्यवहार संबंधी जागरूकता और परामर्श की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए। परिवार, विद्यालय और समाज को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जहां बच्चे बिना डर अपनी बात कह सकें।

रितिक की असमय मौत ने एक परिवार की खुशियां छीन लीं। इस दुखद घटना से सबक लेते हुए हमें बच्चों के हाथों में मोबाइल देने से पहले उनके मन और भावनाओं को समझने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी।

बचपन को मोबाइल की स्क्रीन तक सीमित मत कीजिए। बच्चों को समय दीजिए, उनसे बात कीजिए और उनकी भावनाओं को महत्व दीजिए। क्योंकि बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत महंगे मोबाइल की नहीं, बल्कि परिवार के समय, प्यार और सुरक्षा की है।