शरद कटियार

किसी जिले की प्रशासनिक सफलता का आकलन केवल सरकारी बैठकों, विकास योजनाओं की लंबी सूची और कलेक्ट्रेट में होने वाली समीक्षा से नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह है कि शासन की योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितना पहुंचा, किसान की परेशानी कितनी सुनी गई और आम नागरिक को अपनी जायज मांग के लिए सरकारी दफ्तरों के कितने चक्कर लगाने पड़े।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिलाधिकारी केवल प्रशासनिक मुखिया नहीं, बल्कि शासन और जनता के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होता है। उसकी कार्यशैली में संवेदनशीलता, निर्णय क्षमता और जवाबदेही का समावेश हो तो सरकारी व्यवस्था के प्रति आम आदमी का विश्वास मजबूत होता है।

फर्रुखाबाद की जिलाधिकारी डॉ. अंकुर लाठर के संदर्भ में भी जनता की अपेक्षाएं इसी प्रशासनिक संवेदनशीलता से जुड़ी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचकर समस्याओं को समझना, किसानों से सीधा संवाद करना और जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर ध्यान देना किसी भी प्रशासनिक अधिकारी की सकारात्मक प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।

फर्रुखाबाद कृषि प्रधान जनपद है। यहां खेती केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की जिंदगी का आधार है। किसान को खाद, बीज, सिंचाई, बिजली, फसल खरीद और उचित मूल्य जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है। ऐसे में प्रशासन की जिम्मेदारी केवल निर्देश जारी करने तक सीमित नहीं रह सकती।

जरूरत इस बात की है कि अधिकारी गांवों में जाकर वास्तविक परिस्थितियों को देखें। खेतों में खड़े होकर किसानों की समस्याएं सुनें और संबंधित विभागों को समाधान के लिए जवाबदेह बनाएं।

जब जिलाधिकारी स्वयं ग्रामीण क्षेत्रों का निरीक्षण करती हैं, तो अधीनस्थ अधिकारियों और कर्मचारियों में भी जिम्मेदारी का एहसास बढ़ता है। खेत की मेड़ पर होने वाला संवाद कई बार वातानुकूलित कमरों में होने वाली दर्जनों बैठकों से अधिक उपयोगी साबित हो सकता है।

एक गरीब किसान, विधवा महिला, बुजुर्ग पेंशनभोगी या मजदूर के लिए जिलाधिकारी से अपनी बात कह पाना किसी बड़ी उम्मीद से कम नहीं होता। प्रशासन की जनसुनवाई तभी सार्थक मानी जाएगी, जब शिकायतकर्ता को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समयबद्ध समाधान भी मिले।

जनता को ऐसा तंत्र चाहिए जहां शिकायत दर्ज कराने के बाद उसकी निगरानी हो, जिम्मेदार अधिकारी से जवाब मांगा जाए और निस्तारण की वास्तविकता की जांच भी हो।

डीएम दरबार की सार्थकता इस बात में नहीं कि वहां कितने फरियादी पहुंचे, बल्कि इस बात में है कि कितने लोगों की समस्याओं का स्थायी समाधान हुआ।

केंद्र और प्रदेश सरकारें गरीबों, किसानों, महिलाओं, युवाओं तथा बुजुर्गों के लिए अनेक योजनाएं संचालित कर रही हैं। लेकिन योजनाओं की वास्तविक सफलता तभी है, जब पात्र व्यक्ति तक उनका लाभ पहुंचे।

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, किसान बीमा, आवास योजना, वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, आयुष्मान भारत और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसी योजनाओं में पारदर्शिता बेहद जरूरी है।

प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पात्र व्यक्ति केवल जानकारी के अभाव में लाभ से वंचित न रह जाए। अपात्रों को लाभ मिलने की शिकायतों पर भी निष्पक्ष जांच हो। सरकारी योजनाओं का लाभ किसी की सिफारिश या पहचान का मोहताज नहीं होना चाहिए।

सड़क, नाली, पेयजल, बिजली, विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र और स्वच्छता किसी भी ग्रामीण समाज की बुनियादी जरूरतें हैं। इन सुविधाओं की गुणवत्ता का पता सरकारी अभिलेखों से नहीं, बल्कि गांव में रहने वाले लोगों के अनुभव से चलता है।

इसलिए जरूरी है कि जिलाधिकारी विकास कार्यों का स्थलीय निरीक्षण करें और निर्माण कार्यों में गुणवत्ता, समयसीमा तथा खर्च की पारदर्शिता सुनिश्चित कराएं। सरकारी धन का एक-एक रुपया जनता की सुविधा और विकास पर खर्च होना चाहिए।

प्रशासनिक पद और अधिकार स्थायी नहीं होते। अधिकारी बदलते रहते हैं, लेकिन उनके कार्यकाल की यादें जनता के बीच बनी रहती हैं। किसी जिलाधिकारी की सबसे बड़ी उपलब्धि सरकारी प्रशस्ति पत्र या बैठकों का आंकड़ा नहीं, बल्कि जनता के जीवन में आया सकारात्मक बदलाव होता है।

डॉ. अंकुर लाठर के सामने भी फर्रुखाबाद की जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। किसानों की समस्याओं का समाधान, ग्रामीण विकास में तेजी, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था में सुधार तथा सरकारी योजनाओं की पारदर्शी निगरानी उनकी प्रशासनिक प्राथमिकताओं के महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

आज जरूरत ऐसी अफसरशाही की है जो जनता को अपने कार्यालय तक बुलाने के साथ स्वयं भी जनता के बीच पहुंचने का साहस और संवेदनशीलता रखे। जो किसान की पीड़ा को आंकड़ों में नहीं, उसकी जिंदगी की कठिनाइयों में समझे। जो गरीब की शिकायत को एक साधारण प्रार्थना पत्र नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का विषय माने।

डॉ. अंकुर लाठर के नेतृत्व में फर्रुखाबाद प्रशासन से जनता की अपेक्षा भी यही है कि खेतों से कलेक्ट्रेट तक संवाद और समाधान की एक मजबूत कड़ी बने।

आखिरकार लोकतंत्र की खूबसूरती बड़े सरकारी भवनों में नहीं, बल्कि उस किसान के चेहरे की मुस्कान में दिखाई देती है, जिसकी फसल सुरक्षित है; उस बुजुर्ग की आंखों के सुकून में दिखाई देती है, जिसकी पेंशन समय पर आती है और उस गरीब परिवार की खुशी में दिखाई देती है, जिसे बिना भटके सरकारी योजना का लाभ मिल जाता है।

कुर्सी पर बैठकर शासन करना प्रशासनिक जिम्मेदारी है, लेकिन जनता के बीच पहुंचकर उसका विश्वास जीतना सुशासन की पहचान है।