- कानून का पालन कराने निकले पुलिसकर्मी ही जब सड़क पर असुरक्षित हो जाएं, तो कानून-व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
राजधानी लखनऊ के आशियाना क्षेत्र स्थित मंगल बाजार में जो घटनाक्रम सामने आया है, वह केवल पुलिस और कुछ लोगों के बीच हुआ विवाद नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक व्यवहार और कानून के प्रति घटते सम्मान की गंभीर तस्वीर भी पेश करता है। दुकान लगाने को लेकर शुरू हुआ विवाद इस हद तक पहुंच गया कि मौके पर पहुंचे पुलिसकर्मियों को ही कथित तौर पर भीड़ के गुस्से का सामना करना पड़ा। सिपाहियों के बाल नोचे गए, घूंसे बरसाए गए और एक पुलिसकर्मी को जमीन पर गिराकर पीटने की बात सामने आई है।
यह घटना कई बुनियादी सवाल खड़े करती है। आखिर सार्वजनिक स्थानों पर विवाद सुलझाने की जिम्मेदारी निभाने वाले पुलिसकर्मी ही अगर हिंसा का शिकार होने लगें, तो आम नागरिक की सुरक्षा का भरोसा कैसे कायम रहेगा? क्या किसी को भीड़ का हिस्सा बनकर कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार मिल सकता है?
लोकतंत्र में विरोध करने, अपनी बात रखने और प्रशासन से सवाल पूछने का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है, लेकिन यह अधिकार हिंसा करने या सरकारी काम में बाधा डालने की छूट नहीं देता। वर्दी किसी व्यक्ति की निजी पहचान नहीं, बल्कि कानून और प्रशासनिक व्यवस्था का प्रतीक है। उस पर हमला दरअसल उस व्यवस्था को चुनौती देने जैसा है, जिसके सहारे समाज में शांति और सुरक्षा कायम रहती है।
हालांकि, पुलिस की जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है। किसी विवाद में पुलिस की भूमिका, मौके पर पहुंचने की परिस्थितियां और दोनों पक्षों का व्यवहार निष्पक्ष जांच के दायरे में आना चाहिए। केवल वर्दी के आधार पर किसी को दोषमुक्त या केवल आरोपों के आधार पर किसी को अपराधी घोषित करना न्यायसंगत नहीं होगा।
इस मामले में प्रशासन के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। पहली, पुलिसकर्मियों पर हमले के आरोपों की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करना। दूसरी, यह सुनिश्चित करना कि बाजारों और सार्वजनिक स्थानों पर विवाद की स्थिति में पुलिस समय रहते प्रभावी हस्तक्षेप करे और कानून का पालन कराने की प्रक्रिया पारदर्शी रहे।
लखनऊ जैसे बड़े शहर में मंगल बाजार केवल खरीदारी का स्थान नहीं, बल्कि हजारों लोगों की रोजी-रोटी का माध्यम भी है। ऐसे बाजारों में अतिक्रमण, दुकान लगाने की व्यवस्था, पार्किंग और आपसी विवादों को लेकर प्रशासन को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए, ताकि छोटी-छोटी कहासुनी हिंसक संघर्ष में न बदल सके।
आज आवश्यकता केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की है। पुलिस को सुरक्षा, सम्मान और संसाधन मिलने चाहिए, वहीं नागरिकों को भी यह समझना होगा कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
आखिर सवाल यही है कि अगर सड़क पर कानून की रक्षा करने वाली वर्दी ही सुरक्षित नहीं रहेगी, तो आम आदमी की सुरक्षा का भरोसा कैसे बचेगा? कानून का सम्मान केवल भाषणों से नहीं, बल्कि उसके पालन और उल्लंघन पर निष्पक्ष कार्रवाई से स्थापित होता है।




