* हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर को तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का दिया था आदेश
* ओबीसी आरक्षण तय करने वाली समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट में देरी
* आयोग को रिपोर्ट तैयार करने में तीन महीने और लगने की संभावना
* 20 नवंबर को समाप्त हो रहा आयोग का छह महीने का कार्यकाल
* 26 नवंबर को निवर्तमान ग्राम प्रधानों का प्रशासक के रूप में कार्यकाल होगा समाप्त
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। प्रदेश में निर्धारित समयसीमा के भीतर पंचायत चुनाव कराना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होता नजर आ रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन महीने के भीतर चुनाव कराने के आदेश के बावजूद चुनावी तैयारियों में देरी की आशंका बढ़ गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह पंचायत चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का आरक्षण तय करने के लिए गठित समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट का समय पर तैयार नहीं होना बताया जा रहा है।
जानकारी के मुताबिक आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करने में अभी करीब तीन महीने का अतिरिक्त समय लग सकता है। इसके लिए आयोग जल्द ही प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर अतिरिक्त समय मांगने की तैयारी कर रहा है। आयोग की रिपोर्ट में देरी को आधार बनाकर सरकार भी हाईकोर्ट के सामने अपना पक्ष रख सकती है।
गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर को प्रदेश सरकार को तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया था। वहीं पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी समय पर चुनाव कराने का भरोसा जताया था।
आयोग की कार्यप्रणाली की बात करें तो 14 अक्टूबर तक प्रदेश के 42 जिलों का भ्रमण पूरा हुआ था। अब तक आयोग 52 जिलों का दौरा कर चुका है। प्रदेश सरकार ने 20 जून को आयोग का गठन करते हुए उसे रिपोर्ट तैयार करने के लिए छह महीने का समय दिया था। आयोग का छह महीने का कार्यकाल 20 नवंबर को पूरा हो रहा है।
दूसरी ओर निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में दी गई जिम्मेदारी का छह महीने का कार्यकाल भी 26 नवंबर को समाप्त हो जाएगा। ऐसे में आयोग की रिपोर्ट, ओबीसी आरक्षण निर्धारण और चुनावी प्रक्रिया पूरी करने की समयसीमा को लेकर सरकार के सामने कई प्रशासनिक और कानूनी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
अब सबकी निगाहें आयोग की रिपोर्ट और प्रदेश सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। हालांकि चुनाव टलने को लेकर अभी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।




