- एसजीपीजीआई को नई पहचान देने में निभाई थी ऐतिहासिक भूमिका

- एपेक्स ट्रॉमा सेंटर का सपना भी था महापात्र की दूरदृष्टि का हिस्सा

प्रशांत कटियार

लखनऊ। कुछ लोग केवल अपने पद और उपलब्धियों से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व, विचारों और संस्कारों से इतिहास लिखते हैं। ऐसे ही महान व्यक्तित्व थे प्रख्यात न्यूरोसर्जन, वैज्ञानिक और पद्मश्री प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार महापात्र। उनके निधन ने चिकित्सा जगत को गहरे शोक में डुबो दिया है। लेकिन उनके जाने का दर्द उन लोगों के लिए और भी गहरा है, जिन्होंने उनसे केवल चिकित्सा का ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, ईमानदारी और मानवीय संवेदनाएं भी सीखी थीं।

प्रो. महापात्र के निधन पर उनके शिष्य और लखनऊ के वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. राजकुमार की भावुक श्रद्धांजलि गुरु-शिष्य के उस रिश्ते की मिसाल बन गई, जिसमें गुरु केवल शिक्षक नहीं, बल्कि पिता के समान मार्गदर्शक होता है। डॉ. राजकुमार ने भावुक संदेश में लिखा कि आज उनके जीवन की दुनिया उजड़ गई। प्रो. महापात्र उनके गुरु, मार्गदर्शक और उनके चिकित्सकीय करियर के शिल्पकार थे। उन्होंने कहा कि ऐसे विद्वान, महान शिक्षक और अद्वितीय इंसान रोज-रोज जन्म नहीं लेते।

एसजीपीजीआई को संवारने में महापात्र का था बड़ा योगदान

प्रो. डॉ. अशोक कुमार महापात्र ने वर्ष 2006 से 2009 तक संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई), लखनऊ के निदेशक के रूप में कार्य किया। उनके कार्यकाल में संस्थान की चिकित्सा सुविधाओं, ट्रॉमा सेंटर और प्रत्यारोपण इकाई के विस्तार को नई दिशा मिली। उन्होंने संस्थान में विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाओं के साथ बुनियादी ढांचे और शोध सुविधाओं को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया।

डॉ. राजकुमार के मुताबिक, एसजीपीजीआई में एपेक्स ट्रॉमा सेंटर की परिकल्पना प्रो. महापात्र के सपनों का हिस्सा थी। इस सपने को जमीन पर उतारने और उसे संचालित करने में डॉ. राजकुमार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अनुसार, इस केंद्र ने कोविड महामारी और सड़क दुर्घटनाओं के दौरान लाखों लोगों की जान बचाने में योगदान दिया। इस केंद्र की कार्यप्रणाली और विकास पर प्रो. महापात्र की लगातार नजर रहती थी। डॉ. राजकुमार ने दुख जताया कि जिस संस्थान और केंद्र के निर्माण की परिकल्पना में महापात्र का इतना बड़ा योगदान रहा, वहां आज उनके नाम को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया है।

ईमानदारी और चिकित्सा नैतिकता के थे प्रतीक

डॉ. राजकुमार ने अपने गुरु को ज्ञान का अथाह भंडार, अद्भुत विवेक का धनी और चिकित्सा नैतिकता का मजबूत स्तंभ बताया। उनका कहना है कि प्रो. महापात्र की ईमानदारी का कोई सानी नहीं था। वह केवल एक विश्वविख्यात मस्तिष्क रोग विशेषज्ञ नहीं थे, बल्कि विज्ञान, शोध, नवाचार और मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पित व्यक्तित्व थे।

डॉ. राजकुमार ने लिखा कि वह प्रो. महापात्र के अनेक गुणों के कारण उनकी तुलना भगवान बुद्ध से किया करते थे। गुरु का अपने शिष्यों और उनके परिवारों के प्रति स्नेह तथा चिंता भी असाधारण थी। यही कारण है कि उनके जाने से उनके मन में ऐसा घाव बना है, जो शायद कभी नहीं भर सकेगा।

870 शोध पत्र और 16 पुस्तकों से चिकित्सा जगत को समृद्ध किया

प्रो. महापात्र ने वर्ष 1983 से 2017 तक न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 1996 में प्रोफेसर और 2004 में वरिष्ठ प्रोफेसर बने। उन्होंने विभागाध्यक्ष, न्यूरोसाइंस सेंटर के प्रमुख और शोध अधिष्ठाता जैसे महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। उनके नाम लगभग 870 शोध पत्र और 16 पुस्तकों का उल्लेख किया जाता है।

वह एसजीपीजीआई लखनऊ के निदेशक रहने के बाद वर्ष 2012 से 2016 तक एम्स भुवनेश्वर के संस्थापक निदेशक भी रहे। उन्होंने वहां चिकित्सा शिक्षा और सुपर स्पेशियलिटी सेवाओं को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा वह विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा संस्थाओं में महत्वपूर्ण पदों पर रहे।

गुरु के जाने का दर्द शब्दों में बयां नहीं कर सके डॉ. राजकुमार

डॉ. राजकुमार की श्रद्धांजलि में एक शिष्य का दर्द साफ झलकता है। उन्होंने लिखा कि प्रो. महापात्र केवल उनके करियर के निर्माता नहीं थे, बल्कि उनके जीवन को दिशा देने वाले ऐसे गुरु थे, जिनका स्नेह पिता जैसा था। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान, विज्ञान, आध्यात्मिकता, नैतिकता और सामाजिक सरोकारों का अद्भुत संगम था।

प्रो. महापात्र के निधन से भारतीय चिकित्सा विज्ञान, न्यूरोसाइंस और न्यूरोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया को अपूरणीय क्षति हुई है। उनके योगदान को देश और दुनिया में लंबे समय तक याद किया जाएगा।

एक महान गुरु दुनिया से विदा हो गया, लेकिन उसके संस्कार, सपने और ज्ञान अपने शिष्यों के माध्यम से आगे बढ़ते रहेंगे। यही किसी गुरु की सबसे बड़ी विरासत होती है।