खत्म होता बाजार, बिखरते कुम्हार - एक मार्मिक दास्तां

कमालगंज संवाददाता: कमालगंज थाना क्षेत्र के ग्राम चंदनपुर में प्रजापति समाज की बड़ी आबादी निवास करती है। इनका पुश्तैनी काम मिट्टी के बर्तन और दीये बनाना है। कभी कस्बे से लेकर आसपास के दर्जनों गांव और कस्बा तक इनके बनाए बर्तनों और दीयों की धूम रहती थी, लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक और चाइनीज लाइटों की रंग-बिरंगी चमक के आगे मिट्टी के दीयों की लौ फीकी पड़ गई है।

चंदनपुर निवासी कुम्हार सुरेश प्रजापति बताते हैं कि पहले मिट्टी के दीयों का चलन बहुत ज्यादा था। घरों में दैनिक उपयोग के लिए भी मिट्टी के बर्तन खरीदे जाते थे। त्योहारों पर तो मांग कई गुना बढ़ जाती थी। अब स्थिति यह है कि दीपावली पर दीयों का बाजार पहले की तुलना में महज 5 से 10 प्रतिशत ही रह गया है।

ग्रामीण स्तर पर आज भी दीपावली में मिट्टी के दीयों का धार्मिक महत्व थोड़ा बहुत बचा है, लेकिन शहरों और कस्बों में लोगों का रुझान पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक झालरों और रंग-बिरंगी लाइटों की ओर बढ़ गया है। बाजार में बिकने वाली सस्ती और आकर्षक लाइटों के सामने परंपरा और आस्था का प्रतीक मिट्टी का दीया खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है।

लागत ज्यादा, मुनाफा कम

कारीगरों के मुताबिक 100 दीया बनाने में करीब 50 रुपये की लागत आती है, जिसे वे 100 रुपये में बेचते हैं। पूरे दिन की मेहनत, मिट्टी गूंथने से लेकर आंवा में पकाने तक की कठिन प्रक्रिया के बाद भी बचता है तो सिर्फ 40-50 रुपये का मुनाफा। इतने में परिवार का पेट पालना मुश्किल है।

एक अन्य बड़ी समस्या मिट्टी की अनुपलब्धता है। कुम्हार परिवारों को दीये बनाने के लिए पर्याप्त चिकनी मिट्टी नहीं मिल पा रही है। इस वजह से वे चाहकर भी अपने कारोबार को बड़े स्तर पर नहीं बढ़ा पा रहे हैं। शासन-प्रशासन से कुम्हार समाज को मिट्टी के पट्टे आवंटित करने की मांग लंबे समय से की जा रही है।

रोजगार की तलाश में पलायन

व्यवसाय में घाटा और भविष्य अंधकारमय देखकर नई पीढ़ी इस काम से मुंह मोड़ रही है। चंदनपुर के ही अधिकांश नौजवान परंपरागत व्यवसाय छोड़कर दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में रोजगार की तलाश में चले गए हैं।

इसी गांव के अरुण प्रजापति भी इसी मार का शिकार हैं। परंपरागत व्यवसाय में गुजारा न होते देख अब उन्होंने बटाई पर खेती-बाड़ी शुरू कर दी है। उनके बड़े भाई अशोक प्रजापति ने तो मिट्टी के बर्तन बनाना पूरी तरह छोड़कर गांव में ही मोमोज का ठेला लगाना शुरू कर दिया है।

ऐसे दर्जनों परिवार हैं जो कभी दीपावली पर हजारों की संख्या में दीये बनाकर बेचा करते थे और साल भर की रोजी-रोटी का इंतजाम कर लेते थे। आज वही परिवार इस व्यवसाय को समाप्त होते देख विवश खड़े हैं।

दीपावली रोशनी का त्योहार है, पर __इस रोशनी में अगर मिट्टी के दीये की लौ ही बुझ गई, तो न सिर्फ एक व्यवसाय खत्म होगा, बल्कि हमारी सदियों पुरानी परंपरा और मिट्टी से जुड़ी खुशबू भी कहीं खो जाएगी।