(पंकज चतुर्वेदी - विनायक फीचर्स)
स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सत्ता पक्ष का दायित्व देश के विकास, सुशासन और जनकल्याणकारी नीतियों को आगे बढ़ाना है, जबकि विपक्ष की जिम्मेदारी सरकार की नीतियों की रचनात्मक समीक्षा करना और जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाना है। लेकिन जब विपक्ष की राजनीति रचनात्मक आलोचना के बजाय निरंतर मिथ्या आरोपों, आशंकाओं और नकारात्मक प्रचार तक सीमित होने लगे, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या ऐसी राजनीति वास्तव में लोकतंत्र और समाज के हित में है?
वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच वैचारिक एवं राजनीतिक संघर्ष इसी संदर्भ में चर्चा का विषय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने विकास, बुनियादी सुविधाओं के विस्तार, डिजिटल सेवाओं, गरीब कल्याण, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका को अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं में प्रमुखता दी है। दूसरी ओर कांग्रेस सहित विपक्षी दल सरकार के निर्णयों और उपलब्धियों पर सवाल उठाते रहे हैं। लोकतंत्र में सवाल उठाना आवश्यक है, लेकिन सवालों की विश्वसनीयता उनके पीछे मौजूद तथ्यों और प्रमाणों से तय होनी चाहिए। विकास के दावों का मूल्यांकन और राजनीतिक जिम्मेदारी हम सब की है।
पिछले वर्षों में भारत में बुनियादी ढांचे, राजमार्गों, रेलवे, डिजिटल भुगतान, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, वित्तीय समावेशन और सरकारी सेवाओं की पहुंच में महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है। जनधन खातों, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत अभियान, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री आवास योजना और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं ने सार्वजनिक नीति और सरकारी सेवा वितरण को व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया है और इन सबका प्रत्यक्ष लाभ देश के आम आदमी को सतत रूप से मिल रहा है। शायद यही राहुल गांधी और कांग्रेस की पीड़ा है।
इन योजनाओं की उपलब्धियों का मूल्यांकन केवल सरकारी प्रचार या विपक्षी आलोचना से नहीं, बल्कि लाभार्थियों की संख्या, वास्तविक परिणामों, स्वतंत्र मूल्यांकन और आधिकारिक आंकड़ों से होना चाहिए। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार की उपलब्धियों पर प्रश्न उठाना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन उन उपलब्धियों को बिना पर्याप्त तथ्यों के नकार देना भी स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा नहीं कही जा सकती।
दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी ने निरंतर अपने विकास संबंधी दावों के समर्थन में प्रमाण और परिणाम प्रस्तुत किए, जिन्हें देश की जनता ने स्वीकार करके चुनाव के समय भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में विगत तीन चुनावों से लगातार मतदान भी किया है। इस सब से लोकतंत्र में किसी भी सरकार की जवाबदेही निरंतर बनी रहती है।
देश कांग्रेस के इन आरोपों की राजनीति पर और कांग्रेस की अराजक राजनीतिक भूमिका पर सवाल कांग्रेस से ही पूछ रहा है, जिससे कांग्रेस की स्थिति मज़बूत होने के स्थान पर और कमजोर हो रही है। खोखले आरोपों की राजनीति आज के इस सजग सूचना दौर में टिक नहीं सकती।
लोकतंत्र में विपक्षी भूमिका भी महत्वपूर्ण है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी राजनीति को केवल भाजपा के विरोध के आधार पर परिभाषित करने के बजाय एक स्पष्ट वैकल्पिक विकास दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करे, जो दुर्भाग्य से कांग्रेस के पास नहीं है।
चाहे चुनावी प्रक्रिया पर सवाल हों, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता का मुद्दा हो या सरकारी नीतियों पर आरोप, प्रत्येक विषय पर प्रमाण और तथ्यों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए। उदाहरण के लिए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विपक्ष ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का पक्ष है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य दोहराव और अपात्र प्रविष्टियों को हटाकर मतदाता सूची को शुद्ध करना है। ऐसे विवादों का समाधान राजनीतिक नारों और आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच, प्रमाण और संवैधानिक प्रक्रियाओं से होना चाहिए।
1 नवंबर 2026 को दिल्ली में विपक्षी दलों ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। यह लोकतांत्रिक विरोध का उदाहरण है, लेकिन ऐसे गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच और प्रमाणों की सार्वजनिक समीक्षा भी उतनी ही जरूरी है। यह बात और है कि लाखों की संख्या के दावे वाले कांग्रेस के इस आयोजन में, जिसमें कांग्रेस पार्टी सहित पूरा इंडी ब्लॉक शामिल था, चंद हज़ार लोग ही नज़र आए।
कांग्रेस सहित विपक्षी दलों को यह समझना होगा कि केवल किसी संस्था पर संदेह व्यक्त कर देने से आरोप प्रमाणित नहीं हो जाते। जनता को आरोप के साथ प्रमाण, समस्या के साथ समाधान और आलोचना के साथ वैकल्पिक नीति भी चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी केवल विरोध नहीं, विकल्प प्रस्तुत करना भी है।
एक मजबूत लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष आवश्यक है। लेकिन मजबूत विपक्ष वह नहीं है जो प्रत्येक सरकारी निर्णय का विरोध करे, बल्कि वह है जो गलत नीतियों की तथ्यपूर्ण आलोचना करे और बेहतर विकल्प प्रस्तुत करे।
यदि सरकार कोई जनकल्याणकारी योजना शुरू करती है, तो विपक्ष को उसके क्रियान्वयन में कमियों की पहचान करनी चाहिए और सुधार के सुझाव देने चाहिए। यदि कोई आर्थिक नीति रोजगार, निवेश या किसानों की स्थिति को प्रभावित करती है, तो उस पर आंकड़ों के आधार पर गंभीर बहस होनी चाहिए।
संसद लोकतांत्रिक विमर्श का सर्वोच्च मंच है। वहां जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा, प्रश्नकाल और विधायी समीक्षा का महत्व है। संसद का समय केवल नारेबाजी और व्यवधान में व्यतीत होना जनता के हित में नहीं है। विपक्ष को सदन में चर्चा के अवसरों का रचनात्मक उपयोग करना चाहिए।
हम सब जानते हैं कि सामाजिक जीवन में राजनीतिक मर्यादा और प्रमाण का महत्व है। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रभाव केवल संसद और चुनाव तक सीमित नहीं रहता। उसका असर सामाजिक संबंधों, परिवारों, युवाओं और सार्वजनिक संवाद पर भी पड़ता है। जब राजनीतिक विरोध व्यक्तिगत शत्रुता में बदलता है, तब समाज में वैचारिक विभाजन बढ़ने लगता है।
आज सोशल मीडिया पर राजनीतिक विचारधारा के आधार पर लोगों को अपमानित करना, बिना जांचे आरोप साझा करना और आधी-अधूरी जानकारी के माध्यम से जनमत प्रभावित करना एक गंभीर चुनौती है।
भाजपा का समर्थक होना या कांग्रेस का समर्थक होना किसी नागरिक की लोकतांत्रिक पहचान का हिस्सा हो सकता है, लेकिन किसी भी विचारधारा के समर्थन में तथ्यों और विवेक को छोड़ देना उचित नहीं है। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और पारस्परिक सम्मान बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है।
राजनीतिक जवाबदेही के नए मानदंड में वर्तमान समय में राजनीतिक दलों के मूल्यांकन के लिए कुछ समान मानदंड स्थापित किए जाने चाहिए।
भाजपा तो अपने विकास कार्यों, नीतियों और उपलब्धियों का प्रमाण-आधारित विवरण जनता के सामने निरंतर प्रस्तुत करती ही है। वहीं कांग्रेस को भी केवल विरोध की राजनीति से आगे बढ़कर अपनी नीतियों, नेतृत्व, संगठनात्मक दृष्टिकोण और वैकल्पिक विकास मॉडल को स्पष्ट करना चाहिए।
भारत आज वैश्विक स्तर पर अपनी आर्थिक, तकनीकी, सामरिक और कूटनीतिक पहचान मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का स्तर भी राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप होना चाहिए।
भारतीय जनता पार्टी और उसकी सरकार की उपलब्धियों की चर्चा तथ्यों और परिणामों के आधार पर होनी चाहिए। इसी प्रकार कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को भी अपनी आलोचनाओं को प्रमाणों और रचनात्मक विकल्पों के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। लोकतंत्र में विरोध आवश्यक है, लेकिन निराधार आरोपों को राजनीतिक रणनीति बना लेना स्वस्थ परंपरा नहीं है।
देश को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जो विकास को प्राथमिकता दे, जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाए, संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करे और समाज में सकारात्मक संवाद स्थापित करे।
क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल यह नहीं देखती कि कौन किसका विरोध कर रहा है, बल्कि यह भी देखती है कि कौन देश के लिए क्या कर रहा है। राजनीति की असली कसौटी आरोपों की संख्या नहीं, बल्कि कार्यों की गुणवत्ता, वादों की विश्वसनीयता और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी होनी चाहिए। भारत के लोकतंत्र के लिए खतरा बन रहे घुसपैठियों को देश से और मतदाता सूची से बाहर करना सिर्फ किसी राजनीतिक दल का नहीं, अपितु हम सबका नैतिक दायित्व है और होना भी चाहिए। (विनायक फीचर्स)




