विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने आतंकवाद और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों को लेकर कड़ा संदेश दिया है। दिल्ली में आयोजित ‘चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन’ में उन्होंने कहा कि आतंकवाद वैश्विक शांति के लिए गंभीर खतरा है और इसे किसी भी परिस्थिति में राज्य की नीति का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि दुनिया के सभी देशों को आतंकवाद के हर रूप और तरीके के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए। आतंकवादी गतिविधियों को किसी भी तर्क या बहाने के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। जयशंकर के मुताबिक, इसके बावजूद दुनिया के कुछ हिस्सों में आतंकवाद जारी है, क्योंकि कुछ देश इस मुद्दे पर कठोर रुख अपनाने के बजाय अपने राजनीतिक हितों को प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने कहा कि इतिहास आतंकवाद के खतरों को लेकर कई सबक दे चुका है, लेकिन इसके बाद भी कुछ देश अपने फायदे के अनुसार फैसले लेते हैं। विदेश मंत्री ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आतंकवाद के खिलाफ दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाने की अपील करते हुए कहा कि इस खतरे से निपटने के लिए सभी देशों के बीच साझा प्रयास और मजबूत प्रतिबद्धता जरूरी है।
जयशंकर ने कहा कि आतंकवाद के प्रति किसी भी तरह की नरमी वैश्विक शांति स्थापित करने की कोशिशों को कमजोर करती है। उनके मुताबिक, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में देशों को राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर साझा जिम्मेदारी निभानी चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आतंकवाद के किसी भी रूप को स्वीकार करने या उसके लिए बहाने तलाशने की प्रवृत्ति से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके खिलाफ कार्रवाई कमजोर पड़ सकती है। विदेश मंत्री ने कहा कि दुनिया को अब आतंकवाद के खिलाफ ज्यादा स्पष्ट और दृढ़ रुख अपनाने की जरूरत है। आतंकवाद केवल किसी एक देश की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय स्थिरता और शांति पर भी पड़ता है। ऐसे में सभी देशों के बीच सहयोग और समन्वय महत्वपूर्ण है। सम्मेलन में उन्होंने वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका संदेश था कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरे मानदंडों की जगह एकजुटता और स्पष्ट नीति होनी चाहिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस खतरे का प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सके।
विदेश मंत्री ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी युद्धों और संघर्षों पर भी भारत का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि दुनिया के किसी भी हिस्से में होने वाला युद्ध केवल उसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर वैश्विक शांति और स्थिरता पर पड़ता है। मौजूदा समय में जारी दो बड़े संघर्षों का उल्लेख करते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत का मानना है कि विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से निकाला जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संवाद के रास्ते खुले रहने चाहिए और देशों को मतभेद दूर करने के लिए शांतिपूर्ण उपायों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनके अनुसार, युद्ध और टकराव का प्रभाव व्यापक होता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को शांति कायम रखने के लिए लगातार प्रयास करने चाहिए। जयशंकर के बयान में आतंकवाद के खिलाफ एकजुट कार्रवाई और संघर्षों के समाधान के लिए कूटनीतिक रास्ते अपनाने, दोनों पर जोर दिखाई दिया। उन्होंने वैश्विक परिस्थितियों के बीच देशों के सहयोग और संवाद को महत्वपूर्ण बताते हुए शांति की दिशा में साझा प्रयासों की जरूरत रेखांकित की।
सम्मेलन में जयशंकर ने देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और सहयोग की भावना पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि मानव समाज में हमेशा दो तरह की सोच रही है। एक विचारधारा प्रतिस्पर्धा को महत्व देती है, जबकि दूसरी सहयोग को बेहतर रास्ता मानती है। यही दोनों दृष्टिकोण देशों के आपसी संबंधों और उनके अंतरराष्ट्रीय व्यवहार में भी दिखाई देते हैं। विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का जिक्र करते हुए कहा कि करीब आठ दशक पहले दुनिया के देशों ने मिलकर ऐसी व्यवस्था बनाने का प्रयास किया था, जिसमें साझा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए आपसी सहयोग को बढ़ावा दिया जा सके। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 1 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा उद्देश्यों की भावना को जगह दी गई है। जयशंकर के अनुसार, आज की वैश्विक चुनौतियों के बीच सहयोग की यह सोच और अधिक प्रासंगिक हो जाती है। आतंकवाद, युद्ध और अंतरराष्ट्रीय तनाव जैसे मुद्दों से निपटने के लिए देशों को केवल अपने हितों तक सीमित रहने के बजाय साझा जिम्मेदारियों पर भी ध्यान देना होगा। उनके संबोधन का मुख्य संदेश यही रहा कि वैश्विक शांति के लिए आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता, देशों के बीच सहयोग और विवादों के समाधान में बातचीत तथा कूटनीति को प्राथमिकता देना जरूरी है।

