शमशाबाद। प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रहे किसानों के सामने अब खाद का संकट नई चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। पहले बेमौसम और तेज बारिश से फसलों को नुकसान हुआ, वहीं अब आलू की खेती की तैयारी के बीच DAP और यूरिया खाद की उपलब्धता को लेकर किसान परेशान हैं। किसानों का आरोप है कि सरकारी क्रय केंद्रों पर खाद नहीं मिल रही, जबकि कुछ गुप्त ठिकानों पर खाद की कालाबाजारी की जा रही है। किसानों के मुताबिक, मजबूरी का फायदा उठाकर निर्धारित दर से अधिक कीमत वसूली जा रही है। हालांकि, कालाबाजारी के इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

क्षेत्र के किसानों का कहना है कि इस वर्ष प्राकृतिक आपदाओं ने उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। पिछले साल तैयार की गई आलू की फसल भी मंदी की मार से उबर नहीं पाई थी। किसानों को उम्मीद थी कि नई फसल से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार होगा, लेकिन कुछ दिनों पहले तेज हवाओं के साथ हुई मूसलाधार बारिश ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। बारिश के कारण खेतों में पानी भर गया और कई किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा। जिन किसानों ने खेतों की जुताई-मड़ाई कराकर आलू की गढ़ाई की तैयारी शुरू कर दी थी, उन्हें भी मौसम की मार के चलते नुकसान उठाना पड़ा।

किसानों के मुताबिक, लगातार तीन दिनों तक तेज हवाओं और बारिश का दौर जारी रहने से खेती-किसानी का काम प्रभावित हुआ। खेतों में जलभराव के कारण कई जगह तैयारियां रुक गईं। पहले से आर्थिक संकट झेल रहे किसानों के सामने अब दोबारा खेत तैयार करने और आलू की फसल लगाने की चुनौती है। ऐसे में खाद की कमी ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी है।

किसानों का कहना है कि आलू की खेती में खाद की अहम भूमिका होती है। समय पर DAP और यूरिया उपलब्ध नहीं होने से फसल की तैयारी प्रभावित होने की आशंका है। प्राकृतिक आपदा के बाद किसान किसी तरह हिम्मत जुटाकर दोबारा खेती शुरू करना चाहते हैं, लेकिन सरकारी केंद्रों पर खाद नहीं मिलने से उन्हें निराश होकर लौटना पड़ रहा है। किसानों के अनुसार, बाजार की दुकानों और सरकारी केंद्रों के चक्कर लगाने के बावजूद जरूरत के मुताबिक खाद नहीं मिल पा रही है।

किसानों ने आरोप लगाया कि कुछ विक्रेता दुकानों पर खाद उपलब्ध नहीं होने की बात कहते हैं, जबकि कथित तौर पर दूसरे स्थानों पर उसे अधिक कीमत पर बेचा जा रहा है। उनका कहना है कि DAP और यूरिया के नाम पर मनमानी वसूली की जा रही है। आरोप है कि कुछ लोग दुकानों से अलग स्थानों पर खाद छिपाकर रखते हैं और जरूरतमंद किसानों को चोरी-छिपे बेचते हैं। किसानों के मुताबिक, खाद बेचने वाले कुछ लोग उन्हें इस बारे में किसी से चर्चा नहीं करने की हिदायत भी देते हैं। किसानों का कहना है कि यदि वे इस व्यवस्था के बारे में शिकायत करते हैं, तो उन्हें खाद नहीं मिलने का डर रहता है। इन आरोपों की जांच और संबंधित विक्रेताओं की भूमिका स्पष्ट होना अभी बाकी है।

क्षेत्र में आलू की खेती का काम आमतौर पर सितंबर के मध्य के बाद जोर पकड़ने लगता है। किसान खेतों की जुताई-मड़ाई के बाद आलू की गढ़ाई की तैयारी शुरू कर देते हैं। इस बार प्राकृतिक आपदाओं के कारण खेती का कार्यक्रम पहले ही प्रभावित हो चुका है। अब खाद की कथित कमी और कालाबाजारी की शिकायतों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। किसानों को आशंका है कि यदि समय रहते खाद उपलब्ध नहीं हुई, तो आलू की बुवाई और फसल की तैयारी में और देरी हो सकती है।

फर्रुखाबाद जिला आलू उत्पादन के प्रमुख क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां बड़े पैमाने पर आलू की खेती होती है और स्थानीय मंडियों के साथ उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों तथा दूसरे राज्यों की मंडियों तक आलू पहुंचाया जाता है। जिले की अर्थव्यवस्था में आलू की खेती की महत्वपूर्ण भूमिका है। बड़ी संख्या में किसानों की आजीविका इस फसल पर निर्भर करती है। ऐसे में मौसम की मार के बाद खाद की उपलब्धता को लेकर पैदा हुई समस्या किसानों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई है।

किसानों का कहना है कि एक ओर फसल को हुए नुकसान से आर्थिक स्थिति डगमगा गई है, वहीं दूसरी ओर खेती दोबारा शुरू करने के लिए जरूरी खाद जुटाना मुश्किल हो रहा है। यदि खाद ऊंची कीमतों पर खरीदनी पड़ी, तो खेती की लागत बढ़ जाएगी और संभावित मुनाफा भी प्रभावित होगा। पहले से घाटे का सामना कर रहे छोटे और गरीब किसानों के लिए अतिरिक्त खर्च उठाना आसान नहीं है।